लघुकथा

जब जागो…!

 विधानसभा चुनाव चल रहे थे। गाँव के चौपाल पर कुछ ग्रामीण जिनमें हर आयु वर्ग के लोग शामिल थे कल होनेवाले मतदान के लिए अपनी अपनी पसंद के उम्मीदवारों के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास कर रहे थे।
कुछ युवाओं की बातें सुनने के बाद बुजुर्ग रामदीन बोले, “तुम लोग कुछ भी कह लो, मेरा वोट तो बाबू लालाराम को ही जाएगा।”
” काहें, ताऊ ? कउनो वजह भी तो हो,उन्हें वोट देने की ?”
“अरे वजह काहें नाहीं है ? लालाराम अपनी बिरादरी के हैं।”
” ताऊ ! इ चुनाव बढ़िया नेता चुनने के वास्ते है जो सुख दुःख में आम जनता के साथ खड़ा रहे, उनका काम करे। कउनो रिश्तेदार चुनने का चुनाव थोड़े न है।”
“तुम नाहीं समझोगे बेटा ! नया खून है न तुम लोगन का ? हमरे बाप दादा कहते आए हैं कि हरदम अपनी बिरादरी और अपने लोगन का मदद करो। इ तो मानत हौ न कि दरांती अपनी तरफ ही काटत है। समय पड़े पर विधायक अपनी बिरादरी का हो तो बिरादरी का हर काम आसान होय जात है।”
“ताऊ ! भूल गए का अभी चंद रोज पहले ही तुम अस्पताल में भर्ती अपना भतीजा की खातिर ऑक्सीजन का सिलेंडर के वास्ते इन्हीं लालाराम के सामने गिड़गिड़ा रहे थे और बाद में इहै लालाराम फोन बंद करके बैठ गए रहे। उ तो भला हो उ बृजकिशोर का जिन्होंने एक फोन से सिलेंडर का जुगाड़ करवा दिया था अउर तुमरे भतीजा की जान बच गई रही। तब उ दरांती अपनी तरफ काहें नाहीं चली रही ताऊ ? तब तो इ लालाराम बिरादरी के नाते तुमरा कउनो लिहाज नाहीं किये रहे।…ताऊ ! लकीर का फ़क़ीर बने रहने में कउनो समझदारी नाहीं है। जाति, धर्म, रिश्तेदारी, बिरादरी छोड़कर नेता के अंदर काबिलियत खोजो, ऊके मन मां गरीबन के लिए कुछ करने का जज्बा खोजो, ऊके मन मां सेवा का भाव खोजो और जो उम्मीदवार इ कसौटी पर खरा उतरे उसी को वोट देके जिताओ, फिर उ चाहे कउनो जाति धर्म व बिरादरी का काहें न हो।”
“सही कह रहे हो बेटा ! तुमने हमरी आँखें खोल दी है। सचमुच हम सब अब तक लकीर के फ़क़ीर बने रहे और जाति बिरादरी के नाम पर गलत नेता का चुनाव करके अपना अउर देश का भविष्य खराब करते रहे। लेकिन नाहीं! …अब अउर नाहीं। अब हम भी बदलते भारत की बदलती तस्वीर बनाने में पूरा सहयोग करेंगे और जाति बिरादरी नहीं अपने लिए काम करने वाले नेता का चुनाव करेंगे।”
” इ हुई न बात ताऊ ! जब जागो तभी सवेरा !”

*राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।