कविता

शीत ऋतु

वर्षा रानी की हो गई विदाई
शीत ऋतु की मौसम है आई
शबनम दूब पर गिरी शरमाई
पछुवा हवा ले ठंडक आई

खेत खलिहान में कृषि ने ली अंगड़ाई
धान अरहर सरसों खेतों में लहलहाई
चुनरी ओढ़ ठंडक जब जब है आई
घर घर में निकलने लगी तब रजाई

दूर पहाड़ों पर वर्फ की चादर
सियारों में मच गई है भगदड़
कुत्तों को भी शीत में शामत आई
जब चलती शीत लहरी पछुवाई

धूप सभी को लगते हैं अच्छे
बुढ़ा हो या हाे वो कोई बच्चे
सूरज तब धरा से दूर चला जाता
गरमी को पाने जन मानस तरसता

आग जलाओ गरमी तब पाओ
शरीर पर चादर को लिपटाओ
गरीब जन के लिये आफत आई
शीत लहरी है घर में छुप जाओ भाई

स्वेटर चादर मफलर अच्छे लगते
दिन रात संग सेवा ये हैं करते
दिन भर सूरज लगता है अब प्यारा
आओ भगायें मिल कर सब जाड़ा

— उदय किशोर साह

उदय किशोर साह

पत्रकार, दैनिक भास्कर जयपुर बाँका मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार मो.-9546115088