गीतिका/ग़ज़ल

तेरी भी है और मेरी भी

ये प्रेम की कहानी  तेरी भी है  और मेरी भी ।
वो प्यार की निशानी तेरी भी है और मेरी भी ।।
रात में पलकों पे आकर जो ख़्वाब सोया है ,
वो ख़्वाब सलोनी   तेरी भी है और मेरी भी ।
रूह से रूह का मिलन हुआ जिन तन्हाई में ,
वो शाम-ए-सुहानी तेरी भी है और मेरी भी  ।
धरती पर ना पैर पड़े   हम आसमाँ छू लें ,
 जोश-ए-जवानी तेरी भी है और मेरी भी।
चहरे पे झलके या  नैनों से छलके जो ग़म,
नशे- अश्क़ पानी तेरा भी है और मेरा भी ।
कभी किताबों के पन्ने पलट कर देखो तुम,
ग़म-ए-जिंदगानी तेरी भी है और मेरी भी ।
एक ही चाँद को देखते हैं बारी बारी हम ,
वो रातें मस्तानी तेरी भी हैं और मेरी भी ।
रेतों पे लिखा नाम  लहरों ने मिटा दिया ,
मौजों की रवानी तेरी भी है और मेरी भी।
इश्क़-ए-खुदाया रहगुज़र  और  रहबर ,
ऐसी दीवानगी तेरी भी है और मेरी भी ।
ये प्रेम की कहानी   तेरी भी है और मेरी भी ।
वो प्यार की निशानी तेरी भी है और मेरी भी ।।
— मनोज शाह ‘मानस’ 

मनोज शाह 'मानस'

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