गीतिका/ग़ज़ल

न जाने कितने तूफ़ां यहाँ से गुजर गए

मरहम तेरा क्या करूँ घाव सारे भर गए
डेरा खाली हो गया दर्द सारे डर गए

मझधार में छोंड़ दिया डूबने के लिए
लहरें साथ दे गयीं दरिया पार कर गए

चाहते थे कि हवेली वीरान हो जाये
न जाने कितने तूफ़ां यहाँ से गुजर गए

हमे मालूम था जलजला आएगा एक दिन
देख जरा बरसात में हम और निखर गए

जो दिया है दूसरों को वही तो मिला तुझे
क्या करूँ जो तेरे अरमान आज बिखर गए

ये वक्त है कहा था बदल जएगा एक दिन
बड़ा गुमां था उस दिन और वो मुकर गए

इस (राज) में अब रास्ते बदल लिए मैंने
अतीत दिखाने वाले पता नही किधर गए

— राजकुमार तिवारी ‘राज’

राज कुमार तिवारी 'राज'

हिंदी से स्नातक एवं शिक्षा शास्त्र से परास्नातक , कविता एवं लेख लिखने का शौख, लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र से लेकर कई पत्रिकाओं में स्थान प्राप्त कर तथा दूरदर्शन केंद्र लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक दृष्टि सृष्टि में स्थान प्राप्त किया और अमर उजाला काव्य में भी सैकड़ों रचनाये पब्लिश की गयीं वर्तामन समय में जय विजय मासिक पत्रिका में सक्रियता के साथ साथ पंचायतीराज विभाग में कंप्यूटर आपरेटर के पदीय दायित्वों का निर्वहन किया जा रहा है निवास जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश पिन २२५४१३ संपर्क सूत्र - 9984172782