लघुकथा

खुशियों की चाभी

तलाक के बाद तो शुरू -शुरू में माँ -पिताजी ने सुमंगला को खूब प्यार दिया; दो वर्षीया धेवती मानू को भी खूब दुलार करते थे ।लेकिन भाई की शादी के बाद भतीजे के पैदा होते ही दोनो बदल गए । माला व मानू की तरफ से एकदम मुँह मोड़ लिया ।
अब पिताजी जो भी फल या मिठाई लाते उस पर भतीजे का ही अधिकार होता । पिताजी स्वयं ही कह देते कि “फल सिर्फ गुल्लू के लिए हैं …” यह शब्द सुमंगला के दिल को चीर देते।
माँ भी कम न थी ।मंगला व मानू के साथ खाने पीने में पक्षपात करती ;मानू को दूध देने के लिए मनाही थी। जब माँ ऐसा करती तो भाभी भी मनमानी करती। मंगला अपने लिए तो यह सब सह लेती लेकिन मानू के लिए हृदय द्रवित हो जाता।
अब मानू दसवीं कक्षा में आ चुकी थी ।सुमंगला चाहती थी कि बोर्ड के एग्जाम है बेटी को अच्छा खाना मिले लेकिन हो नही पाता। अतः उससे जितना बन पड़ता स्कूल से लौटते समय फल वगैरह ले आती ; लेकिन उन्हें भी गुल्लू व परिवारिक जन खा पीकर खत्म कर देते मानू के हिस्से थोड़ा बहुत ही आता। घर में रहना था अतः सुमंगला चुप रह जाती ।
“मानू! मैं तुझे कुछ भी नहीं खिला पाती, तेरे इम्तिहान है अच्छा खाना खाए तो…  सुमंगला की बात पूरी हो पाती इससे पहले मानू बोल पड़ी “माँ !कोई बात नहीं… जब मैं पढ़ लिख कर कमाऊंगी,तब हम दोनों खूब फल खाएंगे…., बस इतना सोचो कि हमें खाना मिल रहा है; तुम बताती हो कि पापा ने तो हमें घर से निकाल दिया था… घर तो मिला रहने के लिए।”
सुमंगला बेटी की बात सुनकर हैरान रह गई ।उसे बेटी में खुशियों की चाभी नजर आने लगी।
— दीप्ति सिंह

दीप्ति सिंह

बुलंदशहर (उत्तरप्रदेश)