लेख

भावना

 

भावनाओं के संबंध में एक बात कहना नितांत समीचीन है कि भावनाएं स्वत: जागृति होती हैं। जिसे हम क्रियान्वयन के लिए विवश महसूस करते हैं। इसके लिए रिश्ते, नाते, छोटे बड़े, ऊँच, नीच का मतलब बहुत अधिक नहीं होता।

बहुत बार ऐसा होता है कि हम किसी से मिलते हैं तो उसके प्रति अगाध श्रद्धा और सम्मान का भाव हमारे मन में स्वत: जागृति होने लगता है। तो बहुत बार किसी के लिए बिना मिले ही हमारी भावनाएं उसे आदर देने को प्रेरित करती हैं। ऐसे में जब हम अचानक से कहीं मिलते हैं तो ऐसा लगता है कि कितने दिनों से हम एक दूसरे को जानते पहचानते हैं। ऐसा भी देखने को मिलता है कि आभासी दुनिया ने इस भावना को और मजबूत ही किया है। कल तक हम जिसे जानते तक नहीं थे, आज उसके साथ ऐसा भावनात्मक रिश्ता बन जाता है।जो वास्तविक रिश्तों को भी पीछे छोड़ देता है।

हम सभी को पता है कि भावनाएं सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही दृष्टिकोण की हो सकती हैं। हालांकि नकारात्मक भाव काफी कम ही होते हैं, मगर जो हैं,वे पीड़ा देने की दिशा में आगे बढ़कर भावनाओं को घायल ही करते हैं। फिर भी भावनाओं से जुड़ने वाले रिश्ते प्रगाढ़ता की मिसाल भी बन जाते हैं।

आधुनिकता के युग में हम लाख आगे बढ़ते जा रहे हों, परंतु यदि आपके मन में किसी के प्रति अच्छे भाव बन गये तो फिर आप उसके सामने नतमस्तक होकर भी प्रसन्नता का ही अहसास करते हैं।

भावनाओं से ही रिश्तों में प्रगाढ़ता आती है। जबरन किसी के लिए कोई भावना नहीं जन्म ले सकती। यदि हमारे मन में किसी के लिए अच्छे भाव प्रारंभ में नहीं जगे, तो आगे उस शख्स के लिए अच्छे भाव शायद ही मन में आ पायें।

यह अलग बात है कि भावनाएं भी कभी तो बेहतर साबित होकर उम्मीद से भी अच्छे परिणाम देती हैं, तो बहुत बार उम्मीदों पर कुठाराघात भी करती हैं।

हमारी भावनाएं हमारे संबंधों की महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती हैं, जिससे बहुत बार हमारे जीवन की ऐसी कमी भी पूरी हो जाती है,जिसकी उम्मीद दूर दूर तक दिखाई नहीं देती थी,तो बहुत बार हमसे वो छिन भी जाता है,जिसकी सपने में भी उम्मीद नहीं होती।

भावनाओं पर किसी का जोर नहीं होता। भावनाओं से ही हमारी खुशी और दु:ख का सीधा संबंध माना जा सकता है।

 

 

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921