कविता

मन की खिड़की

मन की खिड़की बंद पड़ी थी
अन्दर जोरों की घुटन थी
तृष्णा की जंजीरों में जकड़े
मोह की श्रृंखला बनी थी।
कोई तो आके खिड़की खोले
उम्मीद की ताजी हवा को अन्दर धकेले
मन की उमस को थोड़ी हवा लग जाए
सपनो को सतरंगी पंख लग जाए
सिलन को दूर कर जाए
ऐसी धूप तनिक भर दो।
मोहमाया की जंजीर क्षीण हो
इस सिलन भरे मन में
अलौकिक धूप भर जाए
उस धूप की ऊर्जा से
मन के सारी खिड़कियां खुली जाए।
— विभा कुमारी “नीरजा”

*विभा कुमारी 'नीरजा'

शिक्षा-हिन्दी में एम ए रुचि-पेन्टिग एवम् पाक-कला वतर्मान निवास-#४७६सेक्टर १५a नोएडा U.P