लघुकथा

कहानी – अंतिम सीढी

मंदा ने अपनी बहन के लिए कुछ खाना बना के रख दिया और खुद तैयार हो अपना टिफिन पैक कर दफ्तर के लिए चल दी थी। माता पिता के अवसान के बाद मंदा ने ही अपने भाई और बहन को संभाला था। उस वक्त वह अठारह साल की थी,कॉलेज के दूसरे साल की परीक्षा खत्म कर नतीजों का इंतजार कर रही थी। माता पिता किसी की बारात में लखनऊ जा रहे थे और वह अपने भाई और बहन दोनों के साथ घर पर रुकी थी। खूब लाड से खाना बनाके दोनों को खिला पिला रही थी ताकि दोनों को मां की याद न आएं। लेकिन उसे ये नहीं पता था कि दूसरी सुबह कितनी भयानक आने वाली थी।
 सुबह 5 बजे किसी ने दरवाजा बहुत ही जोर से खटखटाया और खटखटाए जा रहा था तो वह हड़बड़ाकर उठी और दरवाजा खोला था।और सामने पड़ोसी चाचा खड़े थे जिनके होश हवास उड़े हुए थे।और जो उन्होंने बताया वह सुनके मंदा के होश ही उड़ गए। और थोड़ी देर बाद शबवाहिनी आई और दोनों के शब आंगन में उतार कर चले गए। पड़ोसियों ने उनके लिए आखरी शैया सजा के रखी थी। उसे उनकी शक्ल देख ने के बाद कुछ होश नहीं रहा, उसे होश तब आया उनकी अंतिम यात्रा शुरू हुई थी, दोनों छोटे भाई बहनों को गले लगाकर वह बिलख बिलख कर रो रही थी और अंतिम बार कभी वापस नहीं आने के लिए चले गाएं।
 तब छोटी मोटी नौकरी कर उसने अपनी ग्रेजुएशन का अंतिम वर्ष पूरा किया और फिर मेहनत से आगे बढ़ती रही और कंपनी की  मैनेजर बन गई भाई को डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए हॉस्टल में भेजा और दोनों बहनें साथ रहने लगी।
 बहन के ग्रेजुएशन पूरा होते ही उसने उसे आगे पढ़ने की बात की तो उसने अपनी नामरजी जाहिर की तो  उसने अपनी बहन के लिए अच्छा सा , खानदान घर का लड़का ढूंढा और व्याह करवा दिया।और जतिन भी डॉक्टर बन गया तो उसकी भी शादी करदी और वह भी लखनऊ में स्थाई हो गया। भाई और बहन दोनों अपने अपने जीवन में व्यस्त हो गए थे। अब मंदा अकेली रह गई थी।अब उसके पास कोई ध्येय नहीं था बस अनमानी सी सिर्फ नौकरी कर रही थी।
एक बहुत उदास थी, वह बैठ वह सोचने लगी की अब आगे क्या था उसकी जिंदगी में, तीसी के अखरी सालों में उसे शादी करने का भी तथ्य नहीं रहा था तो आगे क्या! उसके जीवन का अखरी पड़ाव यही था!
— जयश्री बिरमी

जयश्री बिर्मी

अहमदाबाद से, निवृत्त उच्च माध्यमिक शिक्षिका। कुछ महीनों से लेखन कार्य शुरू किया हैं।फूड एंड न्यूट्रीशन के बारे में लिखने में ज्यादा महारत है।