कहानी

कहानी – सपनाती आँखें

एक रात की बात है।आँखें लगी हुई थीं कि यकायक उन्होंने एक सपना देखा। यों तो उन्हें नित्य ही लग जाने पर सपने देखने की आदत ही थी।किन्तु आज जैसा सपना उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। इसलिए उनका चौंकना भी स्वाभाविक था।सपने में जो उन्होंने देखा तो वे चौंक पड़ीं।पर सपना तो देखना ही था। आँखें क्या देखती हैं कि कान देव पधारे हैं और बड़े ही विनम्र भाव से अपनी वेदना निवेदित कर रहे हैं। “बहन जी आपसे कुछ निवेदन करना था।” कान देव बोले।
“कहिए ! कान देव ।आइए पधारिए। इससे पहले कभी आपसे वार्तालाप का सुअवसर प्राप्त नहीं हुआ ,इसलिए हमारा चौंकना स्वाभाविक था।”आँखों ने अपने को सामान्य बनाते हुए कान देव का सहज स्वागत करते हुए कहा।

कान देव कहने लगे: ” यों तो सबकी अपनी -अपनी बहुत सी समस्याएँ होती हैं। किंतु हमारी समस्याएँ ही कुछ इस तरह की हैं कि कुछ कहते नहीं बनता।फिर भी कहने से जी हलका होता है ,इसलिए आपको कष्ट देने के लिए चले आए।”

“अरे कान देव भैया !आप तो हमारे बड़े भाई हैं।हम तो यहाँ पलकों के बीच किसी नवोढ़ा दुल्हन की तरह लुकी छिपी बैठी रहती हैं। आप ही तो हमारे पास खड़े हुए एक सजग प्रहरी की तरह रात- दिन खड़े-खड़े हमारी देखभाल करते हैं। आप हमारे पड़ौसी भी हैं। वह भी मात्र चार अंगुल की दूरी पर । चार अंगुल की भी कोई दूरी होती है भला। कहिए हम आपकी क्या सेवा कर सकती हैं।” बड़े ही विनम्र भाव से आँखों ने कान देव का पलक पाँवड़े बिछाते हुए स्वागत किया।

सीधे -सीधे अपनी बात पर आते हुए कान देव कहने लगे:
” क्या बताएँ आपको।हमें तो बस इस आदमी ने लद्दू खच्चर ही बना दिया है।हमारा काम सिर्फ़ सुनने का है। बोझा ढोने का नहीं।कभी हमें छेदन करके उनमें बालियाँ, कुंडल,झुमके, लोंगें और न जाने क्या – क्या लटका दिए जाते हैं। कोई मिस्त्री हुआ तो उसमें घिसी हुई सड़ी- गली पेंसिल ही अटका देता है। गुटका – तम्बाकू के दीवानों ने तो हमें अपना स्टोर रूम ही समझ लिया है ,जो बची -खुची तम्बाकू या गुटके की पुड़िया हमारे अंदर ठूँस देते हैं। उसकी बुरी गंध से तो हमारा दम ही घुटने लगता है।”

बात का समर्थन करते हुए आँखें बोलीं और कहने लगीं: ” आप ठीक ही कहते हैं भैया जी। कभी – कभी हमारी मजबूरी भी आपको परेशान करती होगी । जब हम कमजोर हो जाती हैं और नर- नारी अपने चश्मे की डंडियाँ तुम्हारे ऊपर तान देते हैं और अनावश्यक बोझ डाल देते हैं। पर क्या करें हमें भी अपने स्वार्थ में आपको कष्ट देना ही पड़ता है।”
“चलो इतना तो चलता है। अगर हम लोग आपस में संवाद नहीं करते तो क्या! एक दूसरे के काम तो आते हैं। एक पड़ौसी भी यदि अपने पड़ौसी के काम न आए तो ऐसा पड़ौसी होना ही बेकार ! पर कभी -कभी
जब चश्मा लगातार लगा रहे तो कष्ट तो होता ही है। पर हम सब सहन कर लेते हैं।क्या हम आपके लिए इतना भी नहीं कर सकते! ” कान देव सहानुभति पूर्वक बोले।

“आपका कष्ट देख – देख कर हमारे भीतर से भी पानी बहने लगता है। पर क्या करें ,हम स्वार्थी जो हुईं।” आँखों ने कहा।

कान देव थोड़ा – सा फड़फड़ाये ,मानो हँस रहे हों।
और कहने लगे: “हमारा मुँह नहीं। हमारी जुबान नहीं ।तो इसका मतलब यह थोड़े ही होता है कि हम सबकी बुरी- भली, गाली-गीत, विस्फोट- संगीत, चुगली -प्रशंसा, थाली -ढोल सब कुछ चुपचाप सुनते रहें। कुछ भी भर दो हमारे भीतर। क्या हमें कंपोस्ट खाद का गड्ढा समझ रखा है इन्होंने! जो अच्छा -बुरा ,गोबर – कीचड़ सब कुछ भर दो। ठीक है सुनना ही हमारा काम है ,क्योंकि हम कान हैं। पर इसका मतलब ये तो नहीं कि ……”
और कहते कहते कान देव रुक गए।

पुनः कहने लगे : ” हमारी तो किस्मत ही खराब लगती है।बचपन में जब कोई विद्यार्थी पढ़ने -लिखने में अच्छा नहीं होता तो हमें ही मरोड़ दिया जाता है। दोष दिमाग का और ऐंठा जाए हमें। ये भी कोई न्याय हुआ भला! कुत्ते की चोट बिल्ली पर! मास्टर जी भी लगता है ,अक्ल से कुछ- कुछ पैदल ही होंगे। जो आव देखा न ताव हमें खामखां लाल कर दिया! ये भी कोई बात हुई भला ! क्या दिमाग का पेच हमारे अंदर लगा हुआ है ? हम कोई दिमाग के स्विच बटन हैं कि लिया औऱ बस ढिरिंग……….”

आँखों को हँसी आ गई और खुशी के आँसू बहाते हुए बोलीं:” ठीक कहत हौ दाऊ!”

कान देव कब रुकने वाले थे। कहने लगे :” उधर देखों उन पंडित जी महाराज को। क्या सारी पंडिताई सूत के तीन धागों में ही भरी पड़ी है ,जो एक और अतिरिक्त अनावश्यक बोझे की तरह हम पर जनेऊ लाद लिया! औऱ तो और उसमें तिजोरी की चाबियों का भारी गुच्छा भी शंका निवारण के समय टाँग लिया। पंडिताइन घर पर छूट गई थीं ,उनको भी लटका लाते। हम तो थे ही लद्दू खच्चर ! उन्हें भी ढोते रहते! और क्या !”

घड़ी ने चार बजे का अलार्म ट्रिंग !ट्रिंग !! ट्रिंग! ट्रिंग !!की ध्वनि के साथ बजाया कान देव ने सुना और आँखें खुल गईं । सपना अब अपना नहीं था। कान देव विदा हो चुके थे।

—  डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम्’

*डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

पिता: श्री मोहर सिंह माँ: श्रीमती द्रोपदी देवी जन्मतिथि: 14 जुलाई 1952 कर्तित्व: श्रीलोकचरित मानस (व्यंग्य काव्य), बोलते आंसू (खंड काव्य), स्वाभायिनी (गजल संग्रह), नागार्जुन के उपन्यासों में आंचलिक तत्व (शोध संग्रह), ताजमहल (खंड काव्य), गजल (मनोवैज्ञानिक उपन्यास), सारी तो सारी गई (हास्य व्यंग्य काव्य), रसराज (गजल संग्रह), फिर बहे आंसू (खंड काव्य), तपस्वी बुद्ध (महाकाव्य) सम्मान/पुरुस्कार व अलंकरण: 'कादम्बिनी' में आयोजित समस्या-पूर्ति प्रतियोगिता में प्रथम पुरुस्कार (1999), सहस्राब्दी विश्व हिंदी सम्मलेन, नयी दिल्ली में 'राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्राब्दी साम्मन' से अलंकृत (14 - 23 सितंबर 2000) , जैमिनी अकादमी पानीपत (हरियाणा) द्वारा पद्मश्री 'डॉ लक्ष्मीनारायण दुबे स्मृति साम्मन' से विभूषित (04 सितम्बर 2001) , यूनाइटेड राइटर्स एसोसिएशन, चेन्नई द्वारा ' यू. डब्ल्यू ए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित (2003) जीवनी- प्रकाशन: कवि, लेखक तथा शिक्षाविद के रूप में देश-विदेश की डायरेक्ट्रीज में जीवनी प्रकाशित : - 1.2.Asia Pacific –Who’s Who (3,4), 3.4. Asian /American Who’s Who(Vol.2,3), 5.Biography Today (Vol.2), 6. Eminent Personalities of India, 7. Contemporary Who’s Who: 2002/2003. Published by The American Biographical Research Institute 5126, Bur Oak Circle, Raleigh North Carolina, U.S.A., 8. Reference India (Vol.1) , 9. Indo Asian Who’s Who(Vol.2), 10. Reference Asia (Vol.1), 11. Biography International (Vol.6). फैलोशिप: 1. Fellow of United Writers Association of India, Chennai ( FUWAI) 2. Fellow of International Biographical Research Foundation, Nagpur (FIBR) सम्प्रति: प्राचार्य (से. नि.), राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सिरसागंज (फ़िरोज़ाबाद). कवि, कथाकार, लेखक व विचारक मोबाइल: 9568481040