धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

मनुष्य कौन है?

हम मनुष्य कहलाते हैं परन्तु क्या हम वात्सव में मनुष्य हैं? हम मनुष्य क्यों कहलाते हैं? इस प्रश्न का उत्तर है कि हमारे पास मन व बुद्धि है जिससे हम विचार कर किसी वस्तु या पदार्थ आदि के सत्य व असत्य होने का निर्णय करते हैं। यदि मनुष्य किसी बात को मानता है तो उसे अवश्य उसका विचार व मनन करना चाहिये कि क्या उसकी मान्यता सत्य है अथवा असत्य है? सत्य को स्वीकार करना चाहिये और असत्य का त्याग करना चाहिये। यदि हम ऐसा करते हैं तो हम मनुष्य कहला सकते हैं, अन्यथा नहीं। हम स्वामी दयानन्द जी के व्यक्तित्व पर विचार कर सकते हैं। उनकी मान्यताओं एवं सिद्धान्तों का हमें ज्ञान है। उन्होंने अपनी सभी मान्यताओं व सिद्धान्तों को सत्य व असत्य की कसौटी पर कस कर देखा और सत्य को स्वीकार व असत्य का त्याग किया। जो बात सत्य की कसौटी पर खरी सिद्ध हुई उसे उन्होंने स्वीकार किया। सत्य के विपरीत बात का उन्होंने त्याग किया। हमें भी ऐसा ही करना चाहिये, तभी हम मनुष्य कहलाने के अधिकारी होंगे।

ऋषि दयानन्द ने अपने लघु ग्रन्थ ‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ में मनुष्य किसे कहना चाहिये, इस विषय में प्रकाश डाला है। वह लिखते हैं ‘मनुष्य उसी को कहना (अर्थात् मनुष्य वही होता है) जो मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामथ्र्य से धर्मात्माओं कि चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उन की रक्षा, उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवत्र्ती सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हों तथापि उसका (व उनका) नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात् जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करे। इस काम में चाहे उस (मनुष्य) को कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी भले ही जावें परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक कभी न होवे।’ इसके आगे भी ऋषि दयानन्द ने कुछ श्लोक देकर अपनी बात को बढ़ाया है। उनके द्वारा उद्धृत एक श्लोक में कहा गया है कि मनुष्य वह है कि जो किसी भी प्रकार की निन्दा व स्तुति अर्थात् प्रशंसा की परवाह नहीं करता, लक्ष्मी आये या जाये, इसकी भी चिन्ता नहीं करता, मृत्यु आज हो या युगों के बाद, इसकी भी उपेक्षा करता है। चाहे कुछ भी हो जाये, सच्चा या वास्तविक मनुष्य सत्य वा न्याय के पथ से कभी विचलित नहीं होता। एक अन्य श्लोक में कहा गया है कि सत्य से बढ़कर धर्म अर्थात् धारण करने योग्य गुण व आचरण नहीं है और असत्य से बढ़कर अधर्म, आचरण न करने योग्य कर्म, नहीं हैं। सत्य से बढ़कर ज्ञान नहीं है। उस सत्य का ही मनुष्य को सदैव आचरण करना चाहिये। ऋषि दयानन्द जी के उपर्युक्त वाक्यों से मनुष्य के कर्तव्यों, धारण करने योग्य गुणों व धर्म पर प्रकाश पड़ता है। यह सभी बातें प्रायः निर्विवाद हैं। सबसे बड़ी गलती व भूल वहां होती हैं जहां मनुष्य अपने अविद्याग्रस्त मतों व उनकी मान्यताओं के आचरण को ही धर्म मान लेते हैं और वैदिक ज्ञान व सत्य धर्म के ज्ञान व आचरण से दूर हो जाते हैं।

सृष्टि के आरम्भ में सृष्टिकर्ता ईश्वर ने मनुष्यों को सत्य व असत्य वा कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध कराने के लिये वेदों का ज्ञान दिया था। सत्य कर्तव्यों का करना और असत्य कर्मों का न करना ही मनुष्य का धारण करने योग्य, धर्म, आचरण व कर्तव्य है। बिना वेदों के ज्ञान के मनुष्य को अपने धर्म व कर्तव्यों का ज्ञान नहीं होता। वेदों से ही ईश्वर व जीवात्मा का सत्यस्वरूप जाना जाता है। ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानकर जो कि मनुष्यों को उसके किये हुए पाप व पुण्य कर्मों का फल दाता है, मनुष्य पाप व बुरे कर्मों से बचता है। वेदों वा वैदिक साहित्य का यदि हम अध्ययन नहीं करेंगे तो हम ईश्वर व जीवात्मा के गुण, कर्म, स्वभाव व स्वरूप को नहीं जान सकते। ईश्वर ने हमें मनुष्य जन्म देकर हम पर महान उपकार किया है। यह जीवन हम सबको वेदों का अध्ययन कर ईश्वर व जीवात्मा सहित सृष्टि को जानने तथा आसक्ति व कामना रहित सद्कर्मों को करके कर्मों में लिप्त न होते हुए ज्ञान व कर्म के बन्धनों से छूट कर मोक्ष प्राप्ति के लिये ईश्वर से मिला है। जो मनुष्य व विद्वान ऐसा करते हैं वह प्रशंसा के पात्र हैं और जो नहीं करते वह अपने बहुमूल्य जीवन को वृथा नष्ट कर रहे हैं।

यदि हम इतिहास ग्रन्थों बाल्मीकि रामायण और महाभारत सहित अपने दर्शनों व उपनिषद आदि ग्रन्थों का अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि हमारे पूर्वज ऋषि, महर्षि, योगी व विद्वान वेदों का स्वाध्याय, चिन्तन व मनन करने के साथ अग्निहोत्र एवं पंच महायज्ञों को किया करते थे। ऐसा करने से वह कर्म के बन्धनों से मुक्त होकर श्रेष्ठ गति अर्थात् मोक्षगामी होते थे। महाभारत के बाद भारत व विश्व के सभी लोग अविद्या से ग्रस्त हो गये। इस कारण वह भौतिक सुखों को ही महत्व देते हैं। वेद, उपनिषद, दर्शन आदि का ज्ञान उन्हें विस्मृत हो जाने के कारण वह अपनी अल्पज्ञ बुद्धि के कारण वेदों तक नहीं पहुंच सकें। आश्चर्य तो हमें भारत के उन विद्वानों वा पंडितों पर होता है जो भारत में वेद व वेदानुकूल वैदिक साहित्य के होते हुए भी अविद्या व वेद विरुद्ध मान्यताओं को मानते व उनका आचरण करते आ रहे हैं। यह ऐसा ही है कि जैसे कि एक प्यासा व्यक्ति कुवें व नदी के तट पर बैठा हुआ पानी पिलाओं चिल्लाता रहे और नदी व कुवें से पानी लेकर पीने के लिये श्रम न करे। ऋषि दयानन्द का भारत व विश्व की मानव जाति पर महनीय उपकार है। उन्होंने वेदों का सत्य ज्ञान मानव मात्र तक पहुंचानें का भरसक प्रयत्न किया। उनकी कृपा से आज हमारे पास चारों वेदों के हिन्दी व अंग्रेजी आदि भाषाओं के भाष्य हैं। हम इनका अध्ययन कर सकते हैं और इनसे प्रेरणा लेकर सद्कर्म करते हुए स्वयं को सच्चा व श्रेष्ठ मनुष्य बना सकते हैं जैसे कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, योगेश्वर श्री कृष्ण, आचार्य चाणक्य, वेद-ऋषि दयानन्द, गुरुकुलीय परम्परा के उद्धारक स्वामी श्रद्धानन्द आदि महापुरुष थे।

वेदों की शिक्षायें सार्वभौमिक एवं जन-जन के लिये हैं। वेदों का अध्येता व उसका आचरण करने वाला मनुष्य ही यथार्थ अर्थों में मनुष्य होता है तथा वेदों के विरुद्ध आचरण करने वाला नास्तिक व साधारण अथवा निम्न कोटि का मनुष्य होता है। मनुष्य बनकर भी जो ईश्वर व जीवात्मा आदि के यथार्थ स्वरूप व इनके गुण, कर्म व स्वभाव को जानने का प्रयत्न नहीं करता अथवा जान लेने के बाद भी ईश्वर की उपासना व अग्निहोत्र यज्ञ आदि नहीं करता उसे हम सच्चा व पूर्ण मनुष्य नहीं कह सकते। इन कृत्यों को न करने से वह ईश्वर, समाज व देश का ऋणी रहता है और अपने ऋण को परजन्मों में अनेक योनियों में जन्म लेकर चुकाता है। अतः सभी मनुष्यों को वेद, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति, सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का अध्ययन कर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिये जिससे उनका सांसारिक जीवन एवं परजन्म सुखों से युक्त हो सकें।

मनुष्य जीवन स्वार्थ सिद्धि के लिये नहीं अपितु ज्ञान प्राप्त कर उस ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के लिये मिला है। मनुष्य को बन्धनों से बचने के लिये सादा-सरल व उच्च विचारों का जीवन ही व्यतीत करना चाहिये। जो मनुष्य जितनी अधिक मात्रा में इन्द्रियों सुखों का भोग करता है वह उतना ही अधिक बन्धनों व दुःखों से ग्रस्त होता है। अतः वेदाज्ञा ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ के अनुसार मनुष्य को सुख के पदार्थ भोगों का भोग त्यागपूर्वक अर्थात् न्यूनतम आवश्यकता के अनुसार करना चाहिये। मनुष्य को अधिक धन संग्रह नहीं करना चाहिये। यदि ईश्वर की कृपा से सत्कार्यों व पुरुषार्थ आदि से धन संग्रहित होता है तो उसे सुपात्रों में दान करना चाहिये। ऐसा करके वह श्रेष्ठ मनुष्य बनेगा और इससे उसका आत्मा देश, समाज व मनुष्य आदि प्राणियों का अल्पमात्रा में ऋणी होगा। मनुष्य का जीवन परोपकारमय होना चाहिये। परोपकार से ही मनुष्य आध्यात्मिक पूंजी एकत्र कर परजन्मों में सुखी व उत्तम गति को प्राप्त होते हैं। ऐसे मनुष्य ही मनुष्य कहलाने के अधिकारी होते हैं। स्वाध्याय से सभी मनुष्यों को अपना ज्ञान बढ़ाना चाहिये और उसके अनुसार कर्म करते हुए श्रेष्ठ कर्मों की पूंजी अर्जित करनी चाहिये। हम वैदिक ज्ञान को प्राप्त कर तथा उत्तम कर्मों को करके ही सच्चे मनुष्य बन सकते हैं और सच्चे मनुष्य ही ईश्वर को प्राप्त होकर बन्धन व दुःखों से मुक्त होते हैं। वेद की आज्ञा का पालन करते हुए हम मनुष्य बनंे और इसके साथ अपने इष्ट, मित्र, बन्धुओं व परिवारजनों को भी मननशील बनाकर व उन्हें निर्बलों की अन्यायकारियों आदि से रक्षा करने की प्रेरणा करके अपने जीवन को सफल करें। ओ३म् शम्।

— मनमोहन कुमार आर्य