कविता

गांव सुहाना बसाते चलें

नववर्ष हम सब कुछ मनाएँ ऐसे,
नील गगन के आंचल में आदित्य जैसे,
तारागण के बीच सोहे चंद्रमा जैसे,
गोपियों के बीच नाचे कान्हा जैसे.
हौसले बुलंद कर रास्तों पर चल दें,
निश्चय ही अपना मुकाम मिल जाएगा,
बढ़कर अकेले हम पहल करें,
देखकर हमको काफिला खुद बन जाएगा.
कुछ को भुलाते चलें,
कुछ का स्वागत करते चलें,
रास्ता आसान हो जाएगा,
मंजिल नई पाते चलें.
स्नेह की सरिता बहाते चलें,
प्रेम-गंगा में नहाते चलें,
नए साल में सबके दिलों में,
गांव सुहाना बसाते चलें.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244