सामाजिक

उम्र के सफ़र में ठहराव भी जरूरी

“मिली है एक ज़िंदगी जनाब यूँ जाया न कीजिए, अपनों के लिए तो बहुत जी लिए ज़रा खुद को खुशी देने की कोशिश  भी कीजिए”
इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी न जाने क्यूँ उन चीज़ों को जोड़ने के लिए भागता रहता है, जो पल भर में तन से साँसों की डोर टूटते ही पीछे छूट जानी है। कोई-कोई तो शरीर साथ दें या न दें, अपनी शारीरिक क्षमता से बढ़कर देह से इतना काम लेते है कि, एक दिन बिना नोटिस भेजें उम्र का सफ़र किरदार से नाता तोड़कर पर्दा गिरा लेता है। क्यूँ ज़िंदगी को इतना थकाना है? 60 साल के बाद कब टिकट का कन्फ़र्मेशन आ जाएगा कोई नहीं जानता! अचानक मौत नाम की ट्रेन सिरहाने आकर खड़ी रहकर जाएगी, एक भी चीज़ को साथ ले जाने का न समय मिलेगा न इजाज़त।
अंतिम सफ़र पर जाना है ये तो तय है, इसलिए सूटकेस में वो सामान ले जानें की तैयारियाँ कीजिए जिसकी उस सफ़र में जरूरत पड़ेगी। शास्त्र कहते है की सत्कर्म और आध्यात्म आत्मा को हर पाप से मुक्ति दिलाता है, तो क्यूँ न मुक्ति का मार्ग अपनाया जाए? एक उम्र के बाद तन-मन को सुकून और शांति की जरूरत होती है। पूरी ज़िंदगी इंसान परिवार वहन की जद्दोजहद से जूझते बिताता है। खुद के लिए जीने का, खुद से मिलने का वक्त निकाल ही नहीं पाता है। सरकार भी साठ साल बाद रिटायर कर देती है। उम्र ठहराव चाहती है और कहती है भौतिक सामान बहुत जोड़ लिया मनवा अब तो ठहर।
कुछ लोग कहेंगे कि हम तो शरीर को एक्टिव और स्वस्थ रखने के लिए काम करते है, चलो मान लेते है आप स्वस्थ रहने के लिए शरीर को एक्टिव रखते है। पर, कभी ये सोचा है काम का टेंशन और काम की वजह से हो रही शारीरिक थकान आपका मानसिक तनाव भी बढ़ाता है। तन-मन को स्वस्थ रखने के लिए उस उम्र में वो सब कीजिए जो ज़िंदगी की आपाधापी से जूझते आपसे  छूट गया है। साठ के बाद जितनी भी उम्र बची है खुद पर खर्च कीजिए। अपने शौक़ पूरे कीजिए, आपमें कोई हुनर है तो उसे तराशिए और अपनी पसंद का काम कीजिए। अपने आसपास नज़र दौड़ाईये बहुत सारे जरूरतमंद लोग दीखेंगे उनकी जरूरत आप तन मन धन आपके पास जो उपलब्ध है उस हिसाब से कर सकते है। साथ ही योगा, व्यायाम और मेडिटेशन को अपना कर खुद को स्वस्थ और व्यस्त भी रखा जा सकता है। इस उम्र में भी खुद के लिए करने को बहुत कुछ होता है।
अगर आप आर्थिक रुप से सक्षम है, आपका वर्तमान सुरक्षित है तो आप भविष्य की और अपने वारसदारों की चिंता छोड़ दीजिए। बहुत कर लिया सबके लिए अब अपने लिए भी थोड़ा जी लीजिए। निकल जाईये चार जोड़ी कपड़े बैग में ड़ालकर दोस्तों के साथ दुनिया घूमने, यात्रा करने। अपनों के लिए तो बहुत जिए, अपने लिए नहीं जिए तो क्या जिए।
— भावना ठाकर ‘भावु’

*भावना ठाकर

बेंगलोर