मेरा अभिमान भी और , स्वाभिमान भी हैं मेरे पापा ।
मेरे घर की खुशियां हैं , और बड़ी शान है मेरे पापा ।
वो इज्जत हैं वो शोहरत हैं , और हमारा साहस हैं ।
हर वक्त दिल में रहते हैं , हां मेरी जान है मेरे पापा ।
आदर्श संस्कार संस्कृति , और सभ्यता तो तुम देखो ।
हमारे घर की एकता और अखंडता हैं मेरे पापा ।
तुम्हारा ऋण मुझसे तो चुकाया कभी जाएगा नहीं ।
इस ऋण से में ऊऋण ,हो नहीं सकता मेरे पापा।
उपकार माता का पिताजी का ,पुत्र कैसे चुकायेगा ।
अगर मां धरती है तो फ़िर आकाश है मेरे पापा ।
जीवन की इस लड़ाई में , सारथी वो मेरे ही बने रहे ।
कितना अमीर हो जाऊं मुझसे , अमीर है मेरे पापा ।
परदेश में हूं मैं लेकिन ,दुआ उनकी साथ रखता हूं ,
फ़ासला कितना भी है पर पास दिल के हैं मेरे पापा ।
मेरी हिम्मत मेरा यक़ीन हैं ‘ मुश्ताक ‘ हां मेरे पापा ।
संघर्षों की आंधी में हौंसलों का , प्रकाश, हैं मेरे पापा ।
— डॉ . मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज़’