लघुकथा

लघु कथा – संस्कार

सड़क दुर्घटना में माता और पिता दोनों को खोने के बाद साक्षी लगभग अवसाद की स्थिति में पहुंच चुकी थी ।एक ही झटके में जब भगवान ने सिर से माता और पिता दोनों का ही साया छीन लिया हो,तो इससे ज्यादा बदकिस्मती बच्चों के लिए क्या हो सकती है। साक्षी बचपन से ही माता पिता की बहुत ही लाडली थी।लेकिन उनके यूं चले जाने के बाद से दिनभर आंसू बहाने के अतिरिक्त साक्षी के पास अब कोई काम शेष नहीं रह गया था।
वह दुखी मन से घर के सारे काम जरूर करती थी, परंतु उसका दिमाग उसके नियंत्रण के लगभग बाहर हो चुका था ।उठते बैठते ,सोते जागते बस हर वक्त उसकी आंखों में माता-पिता का ही चेहरा घूमता रहता था ।इतना बड़ा झटका लगने के बाद साक्षी स्वयं को संभाल नहीं पा रही थी। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसकी दुनिया ही उजड़ गई है।उसके दोनों बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पिछले 2 साल से अमेरिका में रह रहे थे।
साक्षी के पति विवेक साक्षी का पूरा ख्याल रखते थे,उसका दिल बहलाने का हर संभव प्रयास भी करते थे ,परंतु माता-पिता को खोने का दुख क्या होता है ,यह भी वह अच्छे से जानते थे ।इसलिए वह साक्षी को रोने से नहीं रोकते थे ।उनका मानना था कि रोने से और आंसू बहाने से साक्षी कुछ दिनों में हल्का महसूस करने लगेगी और समय बीतने के साथ-साथ उसकी स्थिति में सुधार भी आएगा।
अब साक्षी ने हर जगह आना जाना लगभग बंद कर दिया था। ना वह किसी से बात करती थी ना ही किसी के घर आती जाती थी ।कोरोना के चलते वैसे ही उसका घर से निकलना कम हो पाता था परंतु जरूरी कामों के लिए भी अब उसने घर से निकलना बंद कर दिया। किसी का फोन भी आता तो वह एक-दो मिनट अनमने मन से बात करती और फोन रख देती।
साक्षी की यह हालत उसके मायके वालों से छुपी नहीं थी ।माता-पिता के जाने के बाद मायके में उसका इकलौता भाई और भाभी तथा उनका परिवार था ।माता-पिता को खोने का गम साक्षी के भाई सरस को भी उतना ही था जितना कि साक्षी को ।परंतु बहन को हिम्मत और हौंसला देने में वह कभी पीछे नहीं हटा।
राखी का पर्व लगभग आने वाला था। साक्षी ने रक्षाबंधन के दिन मायके जाने से इनकार कर दिया क्योंकि माता-पिता को इस बार घर पर ना पाकर वह स्वयं को और अधिक कष्ट नहीं देना चाहती थी और भाई भाभी के त्योहार के रंग में भंग नहीं डालना चाहती थी
 इसलिए उसने वहां ना जाने का फैसला किया और अपने भाई को फोन कर कर बोल दिया कि “भैया मैंने राखी भिजवा दी है इस बार मैं नहीं आ पाऊंगी।”
बहन की बात सुनकर सरस ने जिद नहीं की और कहा कि “अगर तुझे ना आने में कम तकलीफ होती है तो मैं नहीं चाहूंगा कि तू आए और यह कहकर उसने फोन रख दिया।
रक्षाबंधन का दिन आया ।त्योहार संबंधी सभी औपचारिकताएं पूरी की,परंतु साक्षी का मन किसी भी चीज में लग नहीं रहा था।त्यौहार के दिन भी वह बुझी बुझी थी और अकेलापन उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।तभी दरवाजे पर घंटी बजी। जैसे ही विवेक ने दरवाजा खोला ,सामने साक्षी के भाई भाभी खड़े थे ।भाई भाभी को देखकर साक्षी फूट-फूट कर रोने लगी।
भाई से पहले जब भाभी ने साक्षी को अपने गले लगाया,उसे सांत्वना दी और प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि “साक्षी दीदी,पापा मम्मी चले गए हैं तो क्या हुआ ,आपके भाई भाभी तो अभी जिंदा है।आपको कभी महसूस नहीं होगा कि पापा मम्मी हमारे साथ नहीं हैं। आज से आपकी यह भाभी आपकी भाभी नहीं आपकी मां हुई। आप उम्र में चाहे मुझसे बड़ी हैं,परंतु भाभी होने के नाते रिश्ते में मैं आपसे बड़ी हूं,इसलिए आज मैं आपसे वादा करती हूं कि पूरे दिल से मैं आपको अपनी बेटी का दर्जा दूंगी और मां बेटी के रिश्ते को ताउम्र निभाऊंगी ।”
भाभी की ऐसी बातें सुनकर साक्षी अपने आंसुओं पर नियंत्रण नहीं रख पाई। परंतु इस बार उसकी आंखों में दुख के नहीं खुशी के आंसू थे।
समाज की इस बदलती सोच और मानसिकता से यही संदेश मिलता है कि न तो सभी भाभियां बुरी होती हैं और ना ही सभी ननद । परिवार द्वारा दिए गए संस्कार तमाम उम्र हमारे साथ रहते हैं और उन संस्कारों की वजह से हम अपने तमाम रिश्ते और संबंधों को निभाते हैं। परिवार का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान होता है परिवार की भूमिका मार्गदर्शक की भूमिका से कम नहीं होती।दिल में अगर प्यार बसता है तो रिश्ते निभाने में कोई दिक्कत नहीं आती जरूरत है सिर्फ अपने सभी रिश्तों को पूरी ईमानदारी और दिल से निभाने की,रिश्तों को प्यार से सजाने की और अपने परिवार द्वारा दिए गए संस्कारों की गरिमा को बनाए रखने की!!!!
— पिंकी सिंघल

पिंकी सिंघल

अध्यापिका शालीमार बाग दिल्ली