गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

इस तरह मिलना -मिलाना आ गया।
जिंदगी के पास आना भा गया।
रुप का दिखना तुम्हारे इस तरह,
चांद धरती पर है जैसे आ गया।
तितलियां मंडरा रही फूलों -फलों पर,
इस तरह मधुमास आना आ गया।
आइना झूठा कहां कब हो सका ,
सच का चेहरा वो हमें दिखला गया।
चाहतों का एक लम्बा सिलसिला,
इस धरा अम्बर में छाना छा गया।
बादलों ने फिर ढ़का था आसमां को,
सूर्य को आना धरा पर आ गया।
— वाई.वेद प्रकाश

वाई. वेद प्रकाश

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