कविता

गाँव और शहर

अपना अपना गाँव

नाते रिश्ते तोड़ 

सब भाग रहे शहरों की ओर 

कोई कहता रोजी नहीं

कोई कहे  शिक्षा 

कोई बोले नहीं मेडिकल 

सुविधाओं का अभाव बोल

निकल पड़े शहरों की ओर 

तुम तो समर्थवान हो

बहुत बहाने हैं 

तुम्हारें पास

निर्बल बताये क्या बहाना  

छोड़ गाँव 

शहर को बसने का 

— ब्रजेश

*ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020