कविता

मस्तमौला

स्वच्छंद, आनंद के सागर में गोते लगातान फ़िक्र, न चिंता प्रकृति से खुद जोड़े रखता खुद को कर्ता मानने के दंभ से दूरईश्वर पर रखता संपूर्ण विश्वासउस पर ही सब कुछ छोड़जीता है वो अपने ही बेलौस अंदाज मेंहर पल खुश रहता, हर दिन को उत्सव सा गुजारतान लाभ की चिंता, न हानि का डरन लोगों की उलाहनाओं से विचलनबस जीता जाता है अपने ही अंदाज मेंहर क्षण को संपूर्णता में जीने की कोशिश मेंबिना मायूस हुए, कमी का रोना रोये बगैरबस खुश है वर्तमान मेंआने वाले पल में भी खुद में बिना बदलाव केजाना चाहता है वो मस्त मलंग फकीर सावो जानता है ईश्वर को, उसकी व्यवस्था कोतभी तो मस्तमौला बनकर जीता हैजीवन का असली आनंद भी वो ही उठाता हैहमें आपको जीवन को पाठ पढ़ाता हैजो हमें आपको समझ कहां आता हैक्योंकि वो तो हमें पागल जो नजर आता हैऔर हमें भरमाने वाला जादूगर लगता हैपर वो तो असल में सच्चा मस्तमौला हैभोलाभाला बड़ा होकर भी बच्चा है।

*सुधीर श्रीवास्तव

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