कविता

कोल्हू का बैल

अभी अभी यमराज मेरे पास आयाऔर चाय की पिलाने का आग्रह करने लगा।मैंने कहा बेवकूफ है क्याजो मुझे बीबी से पिटवाना चाहताकल मेरा जबरन उपवास कराना चाहता है।इतना सुन यमराज गंभीर हो गयाऔर बिल्कुल दर्शन शास्त्री बन गया।और बिल्कुल कथा वाचकों की तरह समझाने लगाबस प्रभु! रही तो मैं आपसे जानना चाहता हूँकि कौन कौन है आपका अपना,आप तो बड़े गर्व से बताते हैं,ये ये ये सब मेरे अपने हैंफिर एक कप चाय पिलाने के नाम से हीबीबी के डर से काँप क्यों रहे हैं?माँ बाप तो मेरे साथ पहले ही निकल गयेबीबी बच्चों,भाई बहनों और जाने कितनों कोबड़े गर्व से अपना बताते हैं।छोटा मुंह बड़ी बात करता हूँ,चाय पिलाने की शर्त रखता हूँ।आज ही सब साफ हो जाएगाकौन अपना और कौन आपको बेवकूफ बना रहा हैअपना बताकर आपको चूस रहा हैअपना हित साध रहा है।पर आप तो इतना भोले होकि मेरी बात का विश्वास नहीं हैक्योंकि आपको बड़े प्यार सेसबके द्वारा इज्जत से नचाया जा रहा है।अच्छा है मेरी बात मान लीजिएकोई नहीं अपना इसे स्वीकार कीजिए।अच्छा है मेरे साथ निकल चलिए,अपना कहने वालों के चक्कर में न पड़िए।अपने यार को पूरे भरोसे से अपना कहिएविश्वास नहीं है तो कोई बात नहींअपनों के चक्कर में पड़े रहिएऔर कोल्हू के बैल की तरह खटते रहिए।

*सुधीर श्रीवास्तव

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