कविता

हवाऐं जो बताती हैं रुख अपना

हवाऐं जो बताती हैं रुख अपना पेडों के सूखे पतों को उडाकर
हसीनाऐ ज़ाहर करती हैं खुशी अपनी
इन्ही हवाओं में अपने दामन को लहराकर
चलते रहना ही काम है इस दुनिया का
निज़ाम जिस का बदल सकता नही
कोइ भी चाहकर लौटकर आते नहीं दुनिया से चले जाने वाले
गुज़ारो इस लिए ज़िनदगी अपनी को मुस्कराकर
तोडा तो होगा बुहत बार दिल आपका बेदर्द लोगों ने ठोकरें मारकर
खुश रहें वो सारे लोग दुनिया के चले गए हैं जो आपको ग़मों में डुबोकर
रहना मुमकिन नहीं हसीनों के दिल में मदन
बदलते हैं जो रंग अपना बदलते मौसम की तरह
रहना है तो रहो उस परमात्मा के दिल में
खुश होता है जो बुहत सबको अपना बनाकर
— मदन लाल

मदन लाल

Cdr. Madan Lal Sehmbi NM. VSM. IN (Retd) I retired from INDIAN NAVY in year 1983 after 32 years as COMMANDER. I have not learned HINDI in school. During the years I learned on my own and polished in last 18 months on my own without ant help when demand to write in HINDI grew from from my readers. Earlier I used to write in Romanised English , I therefore make mistakes which I am correcting on daily basis.. Similarly Computor I have learned all by my self. 10 years back when I finally quit ENGINEERING I was a very good Engineer. I I purchased A laptop & started making blunders and so on. Today I know what I know. I have been now writing in HINDI from SEPTEMBER 2019 on every day on FACEBOOK with repitition I write in URDU in my note books Four note books full C 403, Siddhi Apts. Vasant Nagari 2, Vasai (E) 401208 Contact no. +919890132570