दोहा
माटी जोड़ कुम्हार जो, तू सही रोंदे मोहि
किसी दिन होगा मानना, अक्स जानूँगी तोहि
जीवन हैं तो लायेंगे, घड़ा, सुराही, कंकीर
घर यहीं सुगम पायेंगे, बन के बंदे तकदीर
लगन भरे रंग लगाकर, सब नक्स उतारे जात
असल को पहिचान मन लो, रहस्य कला दर्शात
दुर्बल पर ही ज़ोर चले, गिरकर ढ़ेरी जब होय,
बिना प्रयोग के आदत, रोष भरम बन जो खोय
चलती चक्की सोच मानव, जीवन भी ऐसा होय,
कब इन दो पाटन राहें, जान ले बचा जो कोय
— रेखा मोहन
