कविता

प्रकृति

पत्थरों और भ्रम वाले मायाजालों की
शरण से मुकम्मल निकल
हम प्रकृति की शरण में जा सकते हैं,
अवास्तविक को गंवा कर
वास्तविक को पा सकते हैं,
इसके लिए हमें जाना होगा
नतमस्तक हो पर्यावरण की शरण में,
हम लोग भुलाये बैठे हैं
स्वर्ग नरक और जीवन मरण में,
हमारे सांसों की आपूर्ति
किसके भरोसे है,
चमत्कारियों के एजेंट
अब तक हमें सिर्फ नोचे हैं,
हम किस कदर अंधविश्वास में डूबे हैं,
पाखंडों से अभी तक नहीं ऊबे हैं,
पेड़ हमारी जीवन रेखा है,
पग पग पर उसी को देखा है,
प्रकृति हमारी संस्कृति जीवन और सार है,
हर जीव के प्राणों का आधार है,
कौन है और क्या है
जो हमें कुछ वापस देता है,
सब कुछ सहकर भी हमें
हमारा अमूल्य जीवन देता है,
तो कृतज्ञता हमें किसी चमत्कारी पर नहीं
पर्यावरण पर को देना है,
वर्ना क्या किसी से छीने हैं और
क्या किसी को देना है।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554