ग़ज़ल
सुनो घर बसा कर ढहा ना सकोगे।
कभी बेवफ़ा दिल बना ना सकोगे।।
बढ़ाये क़दम लौट आना पड़ेगा।
क़दम देख पीछे हटा ना सकोगे।।
ख़ुदा दे रहा है आराम कितना।
कहो कुछ अभी देख पा ना सकोगे।।
नज़र की यहाँ बात कुछ और ही है।
यहीं आज ऐसा जता ना सकोगे।।
दग़ा दो मुझे तुम करो आज ऐसा।
सुनो लौट विश्वास पा ना सकोगे।।
यही आज जन्नत अमानत हमारी।
कभी धन हमीं पर लुटा ना सकोगे।।
करोगे वफ़ा फल उसी का मिलेगा।
कभी बात ये ही भुला ना सकोगे।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
