मुक्तक/दोहा

मुक्तक

जब ज़ख़्म नासूर बनने लगे,
अपना ही हिस्सा गलने लगे,
तब बेहतर होता उसे काटना
जो विष शरीर को ग्रसने लगे।

माना कि मुश्किल उसे काटना
बीती बातों संग समय काटना।
पल पल तिल तिल घुटने से अच्छा
गल चुके हिस्से को शरीर से काटना।

कब रहा कौन अकेला, सोचना होगा,
यादों की कारवां संग, सोचना होगा।
जिनको मिला सब कुछ, क्या खुश हैं,
अभावों में भी खुश कैसे, सोचना होगा।

दुख और सुख जीवन का हिस्सा हैं,
जो हमारे भाग्य उसी का किस्सा है।
स्वीकार करना सीखिये जो भी मिला,
दुख भी कृपा प्रभु की, यह परीक्षा है।

— डॉ. अ कीर्तिवर्द्धन