कहानी

पड़ोस की दीवार

गाँव के बीचों-बीच एक छोटा सा चौराहा था, जहाँ दो बड़े घर आमने-सामने बसे थे। एक तरफ़ सरपंच जी का पक्का मकान, दूसरी तरफ़ मास्टर जी की सादा सी रिहाइश। दोनों परिवारों में बरसों से मेलजोल था, मगर दिलों में छिपी कुछ बातें अक्सर दीवार बन जाती थीं।
सरपंच जी का बेटा रमेश जवानी की दहलीज़ पर था। उसके चेहरे पर गाँव की सादगी और आँखों में सपनों की चमक थी। उधर मास्टर जी की बेटी, सुरूर, अपनी मासूम मुस्कान और शरारती आँखों के साथ अक्सर सरपंच जी के आँगन में दिख जाती—कभी पानी लेने, कभी किताब ढूँढने के बहाने। सुरूर का आना-जाना रमेश को भाने लगा था। वह चुपचाप उसे देखता, और सुरूर भी उसकी मौजूदगी को महसूस किए बिना न रह पाती। गाँव की तंग गलियों में उनकी कहानी फुसफुसाहटों में फैलने लगी।
जब सरपंच जी को इस बात का पता चला, तो उन्होंने रमेश को समझाया, “बेटा, पड़ोसियों के साथ रिश्ते नाज़ुक होते हैं, उनमें ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं।” लेकिन दिल के मामले कहाँ किसी की सुनते हैं? सुरूर भी बहाने बनाकर आती रही।
एक शाम, जब पूरा गाँव खेतों से लौट रहा था, सरपंच जी ने मास्टर जी को अपने आँगन में बुलाया। चाय की प्याली के साथ दोनों ने दिल की बातें कीं। सरपंच जी बोले, “मास्टर साहब, हमारे बच्चों के दिल एक-दूसरे की तरफ़ खिंच रहे हैं, क्यों न इस रिश्ते को एक नाम दे दिया जाए?”
मास्टर जी मुस्कराए, “सरपंच साहब, जब दिलों में दीवारें हों, तो पड़ोस की दीवारें भी रुकावट बन जाती हैं।” और वे उठकर चले गए।
सरपंच जी के घर के पीछे एक सुंदर बग़ीचा था, जहाँ रंग-बिरंगे फूल, तितलियाँ और शाम की अजीब सी ख़ामोशी थी। पिछले कुछ दिनों से सरपंच जी ने देखा कि सुरूर अक्सर वहाँ आ जाती—कभी गुलाब के पास गुनगुनाती, कभी आम के पेड़ से कच्ची कैरियाँ तोड़ती, कभी तितलियों के पीछे दौड़ती।
सरपंच जी को उसकी ये बेपरवाही और शरारतें पसंद नहीं थीं। कई बार डाँटना चाहा, मगर उसकी मासूम हँसी और चमकती आँखें देखकर रह जाते। दिल में ग़ुस्सा और बेबसी का मिला-जुला अहसास रहता।
सुरूर की शरारतें बढ़ती गईं—कभी रमेश के नाम चिट्ठी फूलों के नीचे छुपा देती, कभी सरपंच जी के पसंदीदा पौधे को पानी देने आ जाती। एक दिन सरपंच जी ने उसे बग़ीचे में पकड़ ही लिया, “सुरूर! ये तुम्हारी जगह नहीं, बार-बार यहाँ क्यों आती हो?”
सुरूर मुस्कराई, “सरपंच जी, यहाँ के फूलों में एक राज़ छुपा है, जो शायद आप नहीं जानते।”
सरपंच जी चौंके, “कैसा राज़?”
सुरूर ने कुछ कागज़ और तस्वीरें सरपंच जी को दीं। उनमें उनकी जवानी की तस्वीरें, पुराने ख़त और एक अधूरी कविता थी—जो उन्होंने अपनी पहली मोहब्बत के लिए लिखी थी, मगर पूरी नहीं कर पाए थे। सुरूर बोली, “क्या आप नहीं चाहते कि मोहब्बत पूरी हो?”
सुरूर ने धीरे से कहा, “ये बग़ीचा सिर्फ़ फूलों का नहीं, यादों और जज़्बातों का भी है। मैं यहाँ इसलिए आती हूँ क्योंकि यहाँ की ख़ुशबू में आपकी अधूरी कहानी बसी है—जिसका ज़िक्र आपकी डायरी में भी है।”
सरपंच जी की आँखें नम हो गईं। उन्हें अहसास हुआ कि सुरूर की शरारतें दरअसल इस बग़ीचे की गुमशुदा कहानी को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश थीं। उस दिन के बाद सरपंच जी ने न सिर्फ़ सुरूर को बग़ीचे में आने से नहीं रोका,
अब बग़ीचे में मोहब्बत और यादों की नई फ़सल उगने लगी—जहाँ अतीत और वर्तमान गले मिल गए।
सरपंच जी के बग़ीचे में अब हर रोज़ सुरूर की हँसी गूंजती थी। सरपंच जी को लगता था जैसे ये बग़ीचा, ये ख़ुशबू, ये सब अब उनका नहीं रहा—सब पर सुरूर की मासूमियत और शरारत का कब्ज़ा हो गया है। वे सोचते, कहीं ये सब कुछ उनके हाथ से तो नहीं निकल रहा?
एक दिन अचानक ख़बर मिली कि रमेश और सुरूर ने चुपके से कोर्ट मैरिज कर ली है। गाँव में फुसफुसाहटें होने लगीं, सरपंच जी के आँगन में सन्नाटा छा गया। उन्हें लगा जैसे उनकी ज़मीन, बग़ीचा, इज़्ज़त, सब कुछ मास्टर जी के आँगन में चला गया है।
वे चुपचाप अपने कमरे में बैठे, अपनी हथेलियों की लकीरों को देखने लगे—जो सारी उम्र उनकी मर्ज़ी से चली थीं, आज जैसे किसी और की हथेली में समा गई हों।
सरपंच जी ने खिड़की से बाहर झाँका। मास्टर जी के घर में ख़ुशी का माहौल था। रमेश और सुरूर एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े थे। सरपंच जी को लगा जैसे उनकी पूरी ज़िंदगी, मेहनत, घमंड, सब कुछ आज उस लड़की के साथ उस आँगन में चला गया है।
लेकिन तभी, उनके दिल में एक नरम सी लहर उठी। उन्होंने सोचा, “शायद यही ज़िंदगी है—कभी जीत, कभी हार; कभी सब कुछ अपना, कभी सब कुछ किसी और का। मगर असली ख़ुशी तो अपनों की ख़ुशी में है।”
सरपंच जी ने अपनी अहमियत को एक तरफ़ रखा और धीरे-धीरे मास्टर जी के आँगन की ओर चल पड़े। आज पहली बार, वे अपनी मर्ज़ी से हारे थे। और यही हार, शायद उनकी सबसे बड़ी जीत थी।
सरपंच जी के आँगन में अब चुप्पी थी, मगर दिल में एक नई रौशनी जाग उठी थी। उन्होंने महसूस किया कि असली जीत अपनी ज़िद या जायदाद में नहीं, बल्कि अपनों की ख़ुशी को स्वीकारने में है। जब उन्होंने रमेश और सुरूर को साथ हँसते देखा, तो दिल का बोझ हल्का हो गया। उन्होंने पहली बार जाना कि मोहब्बत सिर्फ़ पाने का नाम नहीं, कभी-कभी मोहब्बत में हार जाना ही सबसे बड़ी जीत है।
सरपंच जी ने मास्टर जी के आँगन में कदम रखा। फिज़ा में आम के फूलों की ख़ुशबू थी, और सुरूर की हँसी में बहार की ताज़गी। सरपंच जी ने दोनों बच्चों के सिर पर हाथ रखा और कहा, “बेटा, आज मैं अपनी सबसे बड़ी दौलत तुम दोनों को सौंप रहा हूँ—अपनी दुआएँ, अपनी मोहब्बत, और अपनी अहमियत। ये बग़ीचा अब तुम्हारा है, इसमें जो चाहो, वो फ़सल उगाओ—मोहब्बत की, उम्मीद की या यादों की।”
गाँव के लोग हैरान थे कि सरपंच जी, जो अपनी ज़िद के लिए मशहूर थे, आज सब कुछ हँसकर लुटा रहे हैं। मगर उनके चेहरे पर एक अजीब सी तसल्ली थी—जैसे उन्होंने अपनी हार में ही ज़िंदगी की असली जीत पा ली हो।
आज गाँव में सिर्फ़ दो घरों का नहीं, दो दिलों, दो पीढ़ियों और दो परिवारों का मिलन हुआ था। मोहब्बत ने एक बार फिर रिवाज, ज़िद और अहमियत की दीवारें गिरा दी थीं। अब गाँव की फिज़ा बदल चुकी थी।
सरपंच जी कभी मास्टर जी के आँगन में चाय पीते दिखते, तो कभी मास्टर जी उनके साथ खेतों की मेंड़ पर चलते हुए हँसते-बोलते। रमेश और सुरूर के रिश्ते ने सिर्फ़ दो दिलों को नहीं, बल्कि दो घरों, दो परिवारों और पूरे गाँव को जोड़ दिया था।
अब गाँव के बच्चे भी सरपंच जी के बग़ीचे में खेलते, और सुरूर की हँसी में सबको अपना बचपन सुनाई देता।
लोग कहते, “देखो, मोहब्बत में ज़िद और अहमियत की दीवारें गिर जाएँ तो ख़ुशियाँ खुद-ब-खुद हर आँगन में उतर आती हैं।”
सरपंच जी और मास्टर जी अब सिर्फ़ पड़ोसी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी बन गए थे। गाँव में ख़ुशियों की फ़सल उगने लगी थी, और सबके चेहरों पर मुस्कान के फूल खिल गए थे।
यह कहानी हमें सिखाती है कि जब दिलों में मेल हो, तो हर रंजिश, हर दूरी, और हर अहमियत खुद-ब-खुद मिट जाती है—और गाँव में, या ज़िंदगी में, बस ख़ुशियाँ ही बच जाती हैं।

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह सहज

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।