गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

तड़क सवेरा मध्याहन एंव शाम ढले का नाम है बापू।
सूरज की मर्यादा श्रद्धा शक्ति का वैग़ाम बापू।
दीर्घकालिक मैख़ाने के बीच कहीं भी मिल नहीं सकता,
प्रीति वाला धैर्य वाला कृपा वाला जाम है बापू।
दुनियां ऊपर एैसा तोहफ़ा और कहीं भी मिल नहीं सकता,
मुफ्त अदाएं मुफ्त कलाएं मुफ्तो मुफ्ती दाम है बापू।
जिस के चरणों भीतर प्रभु के दर्शन स्वंय हो जाते,
सब धर्मों से ऊंचा सच्चा सचखण्ड तीर्थ धाम है बापू।
जिसमें शुभआशीषें होती जिस में होती शुभदुआएं,
निम्र अवस्था की झोली से करता एक सलाम है बापू।
जिस की शक्ति भक्ति अर्पण कर्मन दर्शन की है शोभा,
अल्ला ईश मसीहा वाह गुरू सबसे ऊंचा राम है बापू।
सिर्फ़ अकेला चप्पु के बल का साहित तक खेवनहारा,
घर की नौका पर लगाने वाला एक आयाम है बापू।
दोनों एक पर्यायवाची इक दूजे के हैं हमराही,
मां के जो सिंदूर में अंकित वह असली उपनाम है बापू।
बालम जिसके कारण दिखता हरियाली खुशहाली पल-पल।
बहते हुए दरिया की भांति निर्मल चित्त प्रणाम है बापू।

— बलविन्दर बालम

बलविन्दर ‘बालम’

ओंकार नगर, गुरदासपुर (पंजाब) मो. 98156 25409