ग़ज़ल
हम उन्हीं के सभी गीत गाते रहे।
जा उन्हें हम सदा ही मनाते रहे।।
वो अदा क्या रही जो हमें भा गयी।
वे ही पर्दे में खुद को छुपाते रहे।।
पास आते नहीं बैठते भी नहीं।
नित्य पल – पल हमें वे सताते रहे।
कुछ कहा ही नहीं आज तक तो कभी।
देख रुतवा मगर वे दिखाते रहे।
रख दिया देख दीया तभी हाथ पर।
ज़िंदगी भर हमें आजमाते रहे।
प्यार हमने किया क्या ख़ता की भला।
जो हमें आज तक ही रुलाते रहे।।
ग़म ख़लिश दूरियाँ ही दिये जा रहे।
कर दुखी वे हमें मुस्कुराते रहे।
बेखुदी में रहे संग ही आपके।
हम फ़रेब-ए-मुहब्बत ही खाते रहे।
सोचते हम रहे क्या ख़ता ही हुई।
क्यों बिना बात तुम खदबदाते रहे।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
