मुक्तक – बढ़ती उम्र के साथ
बढ़ती उम्र के साथ, शौंक बदल जाते हैं,
चने खाने की ताकत ख़त्म, अंगूर भाते हैं।
सजना सँवरना, स्टाइल के प्रति सजगता,
बच्चों को देख, पुराने शौंक याद आते हैं।
बचपन के दौर की वह शैतानियाँ, अब कहाँ,
बाग़ से आम जामुन चुराना खाना, अब कहाँ?
अच्छी लगती वह लड़की, छुप कर देखते थे,
इज़हारे इश्क़ में ख़तों का चलन, अब कहाँ?
संस्कारों के संरक्षक, बढ़ती उम्र में हो जाते हैं,
जवानी के छिछोरे, बुढ़ापे में पुलिस हो जाते हैं।
रोज खाते थे चाट पकौड़ी, होटल में खाने वाले,
लौकी तौरी की सब्ज़ी, खिचड़ी उत्तम बताते हैं।
हाथ छोड़कर साइकिल चलाना, शान समझते थे,
बच्चों को छोटी छोटी बात पर, आँख दिखाते हैं।
जवानी में नाचते थे डिस्को पर, क्लबों में जाकर,
बढ़ती उम्र में भागवत कथाएँ, राम भजन भाते हैं।
— डॉ अ कीर्तिवर्द्धन
