समाज की सत्यता
कोई खुश है चार दीवारों में
कोई सुख ढूंढता आशियानों में,
कोई वक्त चुराता कामों में
कोई समय गुमाता बहानो में,
कोई सोना उगाता बंजरो में
कोई मोती ढूंढता खजानों में,
कोई जिस्म छिपाता जमाने में
कोई रूप ढूंढता बाजारों में,
कोई खुश है चार दीवारों में।
— ख्यालती टंडन
