रसोई की दीवारें
सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक रसोई में लगी रहती थी। उसकी दुनिया वहीं थी — मसालों के डिब्बे, जलते पराठे और भीगी आँखें।
एक दिन उसकी बेटी ने कहा — “माँ, आपकी दीवारों में धुआँ भरा है। आप कभी बाहर क्यों नहीं जातीं?”
गीता मुस्कुरा दी — “मैं रसोई में बंद नहीं, आदत में बंद हूँ।”
बेटी ने एक पेंटिंग बनाई — रसोई की दीवार पर उड़ती औरत की। उस दिन से गीता ने रसोई के बाहर भी जाना शुरू किया।
— प्रियंका सौरभ
