लघुकथा

रसोई की दीवारें

सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक रसोई में लगी रहती थी। उसकी दुनिया वहीं थी — मसालों के डिब्बे, जलते पराठे और भीगी आँखें।

एक दिन उसकी बेटी ने कहा — “माँ, आपकी दीवारों में धुआँ भरा है। आप कभी बाहर क्यों नहीं जातीं?”

गीता मुस्कुरा दी — “मैं रसोई में बंद नहीं, आदत में बंद हूँ।”

बेटी ने एक पेंटिंग बनाई — रसोई की दीवार पर उड़ती औरत की। उस दिन से गीता ने रसोई के बाहर भी जाना शुरू किया।

— प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh