कविता

तेरा विद्रोही होना जायज है

बरसों पुरानी व्यवस्था हो गर जमी जमाई,
वक्त के साथ की नहीं गर साफ सफ़ाई,
तो सड़ांध उठने की संभावना बनी रहेगी,
नव पल्लव पीढ़ी इसे कैसे,क्यों सहेगी,
उखाड़ फेंक उन व्यवस्थाओं,रिश्तों को,
जो डाल रही है पैरों में जंजीरें,
पलट डाल वर्तमान की सारी तश्वीरें,
रिश्ते एकतरफा निभाने का क्या मतलब,
सिर्फ लालच दिखाए आन पड़े जरूरत जब,
कर विद्रोह अपने स्वतंत्र वजूद के लिए,
अंधविश्वास,पाखंड,अनैतिक नियम
यदि रोक रही राहें,
तो चल ऊंची कर निगाहें,
तोड़ डाल दिखावे का सारा भ्रम,
खुद की वजूद सोच किनारे रख मरम,
न सोच दुनिया क्या कहेगी,
ये अपनी सोच पर कायम रहेगी,
सोच बदल दुनिया जल्दी बदलेगी,
तेरे पीछे आने को परिस्थितियां मचलेगी,
अपनी सदिच्छा पर कायम रह न डर,
बदलाव लाना है तो खुलकर विद्रोह कर।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554