कविता

गुरु पूर्णिमा

गुरु ने पढ़ाया हमें
इतना सिखाया हमें
गुरु-ज्ञान बिना यह
जीवन अधूरा है।

माता पहली गुरु होती
बच्चों का है मल धोती
सारे ही संस्कार देती
बिन उसके जीवन न पूरा है।

प्रकृति की शिक्षा से
शाला की ही दीक्षा से
देश-रक्षा हित नागरिक,
बनता ही सूरा है।

सही राह चलाते हैं
ज्ञान- दीप जलाते हैं
कन्याओं को सिखाते हैं,
छोड़ो मत जिसने भी घूरा है।

थोड़ी शिक्षा ग्रहण कर
मजदूर परिश्रम कर
गुरु को नवाते शीश,
अपना माँगते अजूरा है।

हम बच्चे गये जान
पाना हमको है ज्ञान
जीवन गुणों की खान
पढ़े ही रघु, रामू, भूरा है।

हर क्षेत्र में गुरु ज्ञान,
आता सबके ही काम
मदारी के इशारे पर,
नाचता झमूरा है।

मौसी बिल्ली सिखाती
कलाबाजियाँ बताती
सीखते हैं जंगली जीव,
ज्ञान पाता बघूरा है।

गुरु – ज्ञान की महत्ता
जाने सारी ही सत्ता
उस महान गुरु को,
नवाये शीश लटूरा है।

पाता नहीं ज्ञान जो
नवाता फिर भी शीश वो
कहे ज्ञान सद्गुरु ही देते,
जानो फकीरा देता नूरा है।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’