कविता

नवगीत

तुम्हारी याद में
रहा खोया, नहीं सोया।
नींद आंखों में नहीं थी
प्रीति पैतानें खड़ी थी
देखने को रास्ते
वक्त की पूरी घड़ी थी।
याद में खोकर ही तो
एक सपना मैंने बोया
बहुत रोया
नहीं सोया।
फूल खुशबू से महकते
यह नये दिन
याद से संवरें सजे दिन
रातरानी से महकते
संदली एहसास से दिन।
एक इच्छित स्वप्न बन
कामना का स्वर संजोया
तुमको खोया
बहुत रोया नहीं सोया।
ज़िन्दगी में
क्या कुछ पाना
याद आया प्यार के
सपने सजाना
उस सुखद संसार के
किस्से सुनाना
सिर टिका कर
रात भर सारी पलंग पर
अंक में था प्यार से
मुझको लिटाया
बहुत खोया नहीं सोया
सच में तुम्हें
याद कर बहुत रोया।
चाहतों में बस
खाली अकेलापन
भीड़ में लगता
कहां मन
इस तरह
गुज़रे समय में
घर व बाहर
बस जिया ने चैन खोया।
बहुत रोया नहीं सोया।
प्रेम में
अंखुवायें यौवन
खुशबुओं सा
तन -बदन
यह महकते हुए
संग ही तो संग आया
याद का बिरवा लगाया।
याद कर तुमको
बहुत रोया नहीं सोया।

— वाई. वेद प्रकाश

वाई. वेद प्रकाश

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