मुरझाए मन फिर से खिलेंगे!
बोल न पाएं लाज-भरे अधर,
पर मन सब कह जाता है,
कहना चाहे बात जो मन की,
गीत रूप में गुनगुनाता है।
मादकता नैनों की कहती,
नीरव मौन भी कुछ कहता,
समझ न पाओ इसकी भाषा,
पर मौन मुखर होकर रहता।
तेरी वो सौंधी-सी खुशबू,
उन्मादित करती मन को,
एहसास तो तुमको भी होगा,
अनुरागी होने दो मन को।
लगने दो पंख कल्पना को,
उड़ने दो शब्दों की पतंग,
झूम उठेंगी मन की उमंगें
बज उठेंगे ढोल-मृदंग।
क्षितिज के इस पार या उस पार,
इक बार हम फ़िर मिलेंगे,
शहनाइयां तब खूब बजेंगी,
मुरझाए मन फिर से खिलेंगे!
— लीला तिवानी
