कविता

मुरझाए मन फिर से खिलेंगे!

बोल न पाएं लाज-भरे अधर,
पर मन सब कह जाता है,
कहना चाहे बात जो मन की,
गीत रूप में गुनगुनाता है।

मादकता नैनों की कहती,
नीरव मौन भी कुछ कहता,
समझ न पाओ इसकी भाषा,
पर मौन मुखर होकर रहता।

तेरी वो सौंधी-सी खुशबू,
उन्मादित करती मन को,
एहसास तो तुमको भी होगा,
अनुरागी होने दो मन को।

लगने दो पंख कल्पना को,
उड़ने दो शब्दों की पतंग,
झूम उठेंगी मन की उमंगें
बज उठेंगे ढोल-मृदंग।

क्षितिज के इस पार या उस पार,
इक बार हम फ़िर मिलेंगे,
शहनाइयां तब खूब बजेंगी,
मुरझाए मन फिर से खिलेंगे!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244