गीत/नवगीत

गीत – राखी का त्यौहार

मोह ममता के नग़में गाए राखी का त्यौहार।
शुद्ध आचरण के बिम्ब बनाए राखी का त्यौहार।

सावन की पूर्णिमा पवित्र संस्कारित वाले दिन।
कुदरत ने जन्नत जैसे, गोदी में संभाले दिन।
संकल्प का संदेश सुनाए राखी का त्यौहार।

भाई बहन के प्यार मुहोब्बत के रिश्ते का बंधन।
जैसे अर्चन पूजा वाली थाली में हो चंदन।
दृष्टि परिवर्तन समझाए राखी का त्यौहार।

बहने शुभ आशीषें देती युग युग जीए भाई।
सारी दुनियां में फिर गूंजे शोहरत की शहनाई।
तृतीय नेत्र और बढ़ाए राखी का त्यौहार।

ऋषि लोक तपस्या करते थे इस दिन की प्रतिष्ठा।
म्ंजिल पैरों बीच खड़ी हो दिल में हो गर निष्ठा।
कृषि एवं व्यापार बढ़ाए राखी का त्यौहार।

जैसे कृष्ण भगवान बचाई द्रौपदी की लाज।
ब्रहमार्पण के भीतर बन कर एक दिव्य आवाज़।
मुश्किल का निष्कर्ष सुलझाए राखी का त्यौहार।

भारत मां की निश्लता के सुन्दर गुलशन अन्दर।
बालम जैसे खुश्बू आए पूजा वाले मन्दिर।
प्रबलता के फूल खिलाए राखी का त्यौहार।

— बलविन्दर बालम

बलविन्दर ‘बालम’

ओंकार नगर, गुरदासपुर (पंजाब) मो. 98156 25409