जिंदगी का ठिकाना
ये सांस कब साथ छोड़ दे,
जिंदगी कब मुंह मोड़ ले,
में नहीं जानता हुई है
मुझसे कितनी खता,
खताएं गिने ही नहीं
तो पाऊंगा कैसे बता,
अपना प्यार बड़ा दिल दिखाने को,
हूं सबका हितैषी सबको बताने को,
मैंने अपनों का भी दिल दुखाया है,
सब कुछ होकर भी बहुत तरसाया है,
घर से दूर रह घुट घुट रहा हूं,
रिश्तेदारों के बीच में अनाथालय का दुख सहा हूं,
तब लगता ही नहीं था कि मेरा भी कोई है,
सिर्फ मुझे पता है मेरी आँखें कितनी रोयी है,
उस समय मैं भूल गया था कि
अपनों से दूर रह दूरवाला ही हो गया था,
अपनेपन का भूत काफूर हो गया था,
परिवार के बीच आ फुला नहीं समाया था,
मुझे समझ ही नहीं आया कि
सबने मिलकर असल में मजदूर बुलाया था,
खेती बाड़ी और दिन भर की मेहनत,
सहता रहा सबकुछ भूल तन की दुर्गत,
आज भी ऐसा लगता है मैं उसी दौर में हूं,
नाम है अलग अलग पर उसी ठौर में हूं,
बचा खुचा वक्त अब जैसे तैसे बिताना है,
ये सांस कब रूठ जाये
जिंदगी का क्या ठिकाना है।
— राजेन्द्र लाहिरी
