उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 4)

भरत जी ने उसी समय अपने नाना जी के पास जाकर दूतों द्वारा लाया गया सन्देश सुनाया और अयोध्या से आयी बहुमूल्य वस्तुएँ अपने नाना जी और मामा युधाजीत को भेंट कीं। फिर उन्होंने नाना जी से अयोध्या जाने की आज्ञा माँगी। राजा ने उनको प्रातःकाल जाने की आज्ञा दी। फिर भरत जी ने अपनी नानी से भी आज्ञा ली।
प्रातःकाल जब राजकुमार भरत और शत्रुघ्न चलने लगे, तो उनके नाना केकयराज ने उनको बहुत सी बहुमूल्य वस्तुएँ भेंट में दीं। उन्होंने उनके साथ कुछ सेना और अपने कई विश्वस्त मंत्री भी भेज दिये थे, जो उनकी और भेंट की गयी वस्तुओं की सुरक्षा कर रहे थे। फिर दोनों राजकुमार उत्तम रथों पर सवार होकर अयोध्या के लिए चल पड़े।

राजगृह से निकलकर भरत जी अपने दल के साथ पूर्व दिशा की ओर चले। उन्होंने पहले सुदामा नदी को पार किया, फिर ह्यादिनी नदी को लाँघकर पश्चिम की ओर बहने वाली सतलुज नदी को पार किया। फिर वे आगे चले और कई नदियों को पार करके चैत्ररथ नामक वन में पहुँचे।

उसके बाद उन्होंने पश्चिमवाहिनी सरस्वती और गंगा जी की एक धारा के संगम से होते हुए वीरमत्स्य देश के उत्तरवर्ती प्रदेशों में पैर रखा और वहाँ से आगे बढ़कर वे भारुण्डवन के भीतर गये। वहाँ उन्होंने कुलिंगा नदी को पार किया और यमुना के तट पर जाकर विश्राम किया।

इस प्रकार अनेक प्रदेशों, वनों और नदियों को पार करते हुए वे उज्जिहाना नगरी के उद्यान में पहुँच गये। वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते उनको सात दिन हो गये थे। इसलिए उनको लेने आये हुए दूत शीघ्रता करने को कह रहे थे। इसलिए भरत जी ने अपने रथ में तीव्रगामी घोड़ों को जोत दिया और सेना को धीरे-धीरे पीछे आने का आदेश देकर स्वयं तेज़ी से अयोध्या की ओर बढ़े।

मार्ग में सात रातें बिताने के बाद आठवें दिन भरत जी ने अयोध्या पुरी के दर्शन किये। सामने अयोध्या को देखते ही वे अपने सारथी से बोले, “आज मुझे अयोध्या प्रसन्न नहीं लग रही है और किसी सफ़ेद मिट्टी के टीले जैसी दिखाई दे रही है। क्या यह वही अयोध्या नगरी है जहाँ निरन्तर यज्ञ-याग करने वाले विद्वान ब्राह्मण निवास करते हैं और वेदपाठ करते हैं? पहले जो हर्ष ध्वनियाँ आया करती थीं, अब वे कहीं सुनायी नहीं पड़ रही हैं। सब ओर सन्नाटा-सा लग रहा है।

सायंकाल लोग उद्यानों में खेल-कूद और मनोविनोद किया करते थे, वे भी नहीं हैं। पहले की भाँति लोग आते-जाते भी दिखायी नहीं दे रहे। वे उद्यान अब परित्यक्त जैसे रोते हुए दिखाई दे रहे हैं। पहले घरों से जो सुगन्धित धुआँ उठा करता था, वह भी नहीं है। मुझे अनेक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं, जिनसे मेरा मन खिन्न है। ऐसा लगता है कि अयोध्या में सब कुशलमंगल नहीं हैं।”

सारथी के पास भरत जी की बातों का कोई उत्तर नहीं था। वह सांत्वना देते हुए केवल यही कह रहा था- ”राजकुमार, आप चिन्ता छोड़ दीजिए, सब कुशलमंगल होगा यही आशा कीजिए।“

ऐसी बातें करते हुए भरत जी ने पश्चिमी नगरद्वार “वैजयन्त” से अयोध्या पुरी में प्रवेश किया। उस समय उनके रथ के घोड़े बहुत थक गये थे। वहाँ नगरद्वार के रक्षक द्वारपालोें ने उनको देखते ही ‘महाराज की जय हो!’ कहकर उनका अभिवादन किया और उनके साथ चलने लगे। लेकिन भरत जी ने उन द्वारपालों को सत्कार करके लौटा दिया और अपना रथ लेकर शत्रुघ्न जी के साथ ही राजभवन की ओर चले।

मार्ग में भी उन्हें अनेक अनिष्टसूचक चिह्न दिखायी दिये। इस बात को याद करके कि उनको बिना कारण बताये अचानक बुलाया गया है, उनको निश्चय हो गया कि यहाँ कोई भयंकर दुर्घटना घट गयी है। वे अपने सारथी से बोले- ”सूत! लगता है कि राजमहल में सब कुशल नहीं हैं। मुझे अनेक विनाश के सूचक लक्षण दिखायी दे रहे हैं।“ सारथी ने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। मन ही मन दुःखी होते हुए भरत जी राजमहल में गये।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण कृ. 8, सं. 2082 वि. (18 जुलाई, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com