विशाल छत के नीचे
कहां से आती है हवा वह
मन में फुरती लाती है हर बार
चलता हूं तेज से तेज
दुनिया के हर कोने में हल्के से
अपना कदम लेता हूं मैं
बच्चा बनकर कूदता – खेलता हूं
खो जाता हूं मैं अपने आपको
विशाल छत के नीचे ।
दुनिया बदलती है देखता हूं
जगत का हर व्यवहार
अजीब सा लगता है मुझे
कौन सा रहस्य वह
छिपा हुआ है इस जीवन यात्रा में !
जीवों की हर चेष्टा मुझे
सोचने को मजबूर करता है
हर पौधे में नये पल्लवों की आशा में
आंख बिछाकर देखता हूं
हर इंसान अपनी अस्मिता लेकर
नये कदम लेने का सपना
मेरा है इस मानव जग में ।
