ग़ज़ल
खूब कसमें बड़ी वो खाएगा।
भूल कर सच नहीं बताएगा।
देर तक दूर तक घुमाएगा।
बात कोई न पर बताएगा।
रूठने को तो रूठ जाएगा।
देर तक पर नहीं सताएगा।
साफ़ मुंह पर सभी बताएगा।
यार दर्पण न कुछ छुपाएगा।
नक्श जो दिल पे हो गये तेरे,
नक्श कैसे भला मिटाएगा।
— हमीद कानपुरी
