कविता

जीवन उत्सव

मत कर मनवा क्रोध, पाप की खाई।
मीठी वाणी बोल, सभी मन भाई।।
कुछ दिन का है साथ, खुशी से जीना।
जीवन अमिरस जाम, झूम कर पीना।।

रोते आया पार्थ, मिला है मौका।
ढीली-ढाली गेंद, मार ले चौका।।
मन में है विश्वास, तोड जंजीरे।
जीवन उत्सव मान, खोज ले हीरे।।

मतलब के है लोग, स्वार्थ है भारी।
झूठे सारे बंध, खोखली यारी।।
इम्तिहान है रोज, यत्न नित जारी।
डर कर तट पर बैठ, जंग मन हारी।।

— कुसुम अशोक सुराणा

कुसुम अशोक सुराणा

मुंबई महाराष्ट्र