खुद में झाँक
भीतर-भीतर कुतर रहा मन,
विघ्नहर्ता का मुषक,
व्याकुल-आकुल चेतन,
होता स्व-अस्तित्व पर शक।।
जीवन-साँझ की है बेला,
आँगन चंपा-चमेली का मेला।
देहरी पर जलते दीये सी,
हर लम्हा जीती नितांत अकेला।
कल ने किया है किनारा,
भविष्य का चिंता में गुजारा।
आज ढूंढता रोज बहाना,
बूढ़े कदमों को कौन दे सहारा?
खूंट से तने पर देख कोंपले,
मन में मची उथल-पुथल,
खुद्दारी के पहन छल्ले,
क्यों न चलूँ मैं हौले-हौले।
अकेलापन कर सहर्ष स्वीकार,
क्यों न करूँ बौद्धिक विकास?
अनदेखा कर स्वजन-बेरुखी,
क्यों न सजाऊं मैं नवलखा हार।
एकांत माँ पाणिनि का वरदान।
टूटती आस का श्रेष्ठ उपदान।
खुद में झाँकने का अमूल्य वर
ज्ञानार्जन का बेहतरीन अवसर!!
— कुसुम अशोक सुराणा
