कविता

कहासुनी

मन से आगे बढ़ना सीखो !
मन से मिलना सीखो!
आपस में क्या लड़ना ?
मन न मिले तो दूर हो जाओ !
मन ही मन क्यों किसी को कोसना ?
माटी का खिलौना हो, माटी में है मिलना,
किस पर इतना अभिमान करना,
क्या है मेरा इस जग में ?
बस मोह का बन्धन है,
यहाँ सुलझे हुए भी उलझे हुए हैं,
दो दिन की है जिंदगानी,
तू तू मैं मैं क्यों किसी से करना ?
तुमने कहा मैंने सुना,
मैंने कहा तुमने सुना,
मन में गाँठ मत रखना,
कहासुनी हो गई तो,
बात को दिल से मत लेना,
अपनों से क्यों झगड़ना ?
प्रेम से मिलकर रहना सीखो !

— चेतना सिंह

चेतना सिंह 'चितेरी'

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