कविता

प्रकृति प्रेमी

बस पेड़ गुंगे थे पर प्राण विहीन नहीं,
प्रकृति कर रही थी पुकार बस अपनी मौन भाषा में
और वही समझ पा रहे थे जिसे हमने उन्हें नहीं समझा।
तेरे बिना उस जंगल में प्रेम की बंसी कौन सुनाता?
हवा हंस-हंसकर कह रही थी- मैं अपनी मां की गोद में,
प्रकृति की बहन को गले लगा-लगाकर
गा रही थी – अपने मधुर गीत, मधुर धुन में!
तभी अचानक जंगल में कोहराम मचा ।
तुम पेड़ों को काट रहे थे बेरहमी से और
मैं महसूस कर रहा था और रो रहा था
जैसे मेरे बच्चों पर धारदार वार से हमला हो वैसे.

— डॉ. कान्ति लाल यादव

डॉ. कांति लाल यादव

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