उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 10)

अयोध्या से शृंगवेरपुर तक का मार्ग सुधारने का आदेश पाते ही विशेषज्ञों और कुशल श्रमिकों का दल अपने साथ आवश्यक औजार और सामग्री लेकर निकल पड़ा। उनमें मार्ग का ज्ञान रखनेवाले, मार्ग की रक्षा करनेवाले, भूमि खोदनेवाले, नाव आदि बनानेवाले, रथ और वाहनों को बनाने और सुधारनेवाले, पेड़ काटनेवाले, चटाई आदि बनानेवाले और पानी भरनेवाले भी शामिल थे। वे सभी महान् उत्साह के साथ मार्ग को सुगम बनाने के लिए चल पड़े, ताकि उन पर रथ आदि वाहन सरलता से निकल जायें।

अयोध्या से निकलते ही उन्होंने अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया। वे मार्ग की झाड़ियों और उन वृक्षों को काटने लगे, जो रथों के मार्ग में बाधक बन सकते थे। उन्होंने ऊँची-नीची भूमि को समतल किया और गड्ढ़ों को मिट्टी डालकर भर दिया। जहाँ जल आदि से मार्ग रुका हुआ था, वहाँ पत्थर डालकर सुगम मार्ग बनाया। यत्र-तत्र बाधा बनने वाले पत्थरों को तोड़कर समतल कर दिया। मार्ग में यात्रियों के लिए पेय जल सुगमता से मिलता रहे, इसके लिए उन्होंने कुओं को चिह्नित किया और जहाँ आवश्यक था वहाँ उन तक जाने का सरल मार्ग बनाया।

इसी प्रकार उन्होंने मार्ग में विश्राम करने के लिए बड़े-बड़े वृक्षों को पहचाना और उनके नीचे का स्थान स्वच्छ कर दिया। जहाँ वृक्ष कम थे, वहाँ उन्होंने कपड़े के शिविर लगाने की भी व्यवस्था कर दी। इस प्रकार उन सभी ने मिलकर कम समय में ही शृंगवेरपुर तक का मार्ग सभी के लिए सुगम बना दिया।

इधर अयोध्या नरेश के सभाकक्ष में गुरु वशिष्ठ आदि श्रेष्ठजन अपने-अपने आसनों पर विराजमान थे। तब वशिष्ठ जी ने भरत जी से मधुर वाणी में कहा- “तात! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ धन-धान्य से पूर्ण पृथ्वी का यह राज्य तुम्हें देकर स्वयं धर्म का पालन करते हुए स्वर्गवासी हुए हैं। इसी प्रकार श्री राम भी अपने धर्म के अनुसार ही अपने पिता की आज्ञा का पालन करके वन को गये हैं। उन्होंने पिता की आज्ञा का उल्लंघन करने का अधर्म नहीं किया है।

उन दोनों ने धर्मपूर्वक ही यह राज्य तुम्हें प्रदान किया है। इसलिए तुम भी पिता की आज्ञा का उल्लंघन मत करो और अपने मंत्रियों के परामर्श के अनुसार राज्य का पालन करने के लिए शीघ्र अपना अभिषेक करा लो। इसी में सबका हित है। तुम इस राज्य का पालन और रक्षण करने में पूरी तरह समर्थ हो।”

गुरु की यह बात सुनकर भरत जी शोक में डूब गये और आँसू बहाते हुए बोले- “गुरुदेव! आप जानते हैं कि सदा धर्माचरण करने वाले श्री राम ही इस राज्य के अधिकारी हैं। मैं उनके राज्य का अपहरण कैसे कर सकता हूँ? कोई छोटा भाई यह अधार्मिक कार्य नहीं कर सकता। मैं और यह सारा राज्य श्री राम का ही है, यह मानकर आपको इस सभा में धर्मसंगत बात ही कहनी चाहिए।

पूज्यवर! मेरी माता ने जो पाप किया है, मैं उसका सहभागी नहीं बनूँगा। उसके इस कार्य में मेरी लेशमात्र भी सम्मति नहीं है। मैं इसका घोर विरोध करता हूँ। नरश्रेष्ठ श्री राम ही इस राज्य के राजा होने के योग्य हैं। वे मुझसे अवस्था में बड़े और गुणों में भी बढ़-चढ़कर हैं। वे अपने महान् पूर्वजों दिलीप और नहुष के समान तेजस्वी हैं। अतः महाराज दशरथ की तरह ही वे इस राज्य को पाने के सर्वश्रेष्ठ अधिकारी हैं।

गुरुदेव! मैंने निश्चय किया है कि श्री राम को वन से लौटाने के लिए मैं स्वयं जाऊँगा और उनकी विनती करके उन्हें वापस अयोध्या लाऊँगा। यदि मैं श्री राम को वन से लौटाकर न ला सका, तो मैं भी भाई लक्ष्मण जी की तरह वहीं पर निवास करूँगा। मैं श्री राम को बलपूर्वक वापस लाने के लिए समस्त उपाय करूँगा। मैंने मार्गशोधन के लिए कुशल कार्यकर्ताओं को पहले ही यहाँ से भेज दिया है। मुझे श्री राम के पास चलना ही अच्छा लगता है।”

भरत जी का यह दृढ़ निश्चय सुनकर मुनि वशिष्ठ ने फिर उन पर राज्य ग्रहण करने के लिए दबाव नहीं डाला। उन्होंने कहा- ”राजकुमार! यदि तुम्हारी यही इच्छा है, तो हम ऐसा ही करेंगे। हम भी तुम्हारे साथ वन को चलेंगे और श्री राम को लौटा लाने का प्रयत्न करेंगे।“ यह सुनकर भरत जी का मुख प्रसन्नता से खिल उठा और उन्होंने अपने स्थान पर ही खड़े होकर गुरु को हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

भरत जी ने अपने गुरु वशिष्ठ जी की भी आज्ञा नहीं मानी, क्योंकि वे स्वयं को राज्य का अधिकारी नहीं मानते थे। वे जानते थे कि राजा का पद ग्रहण करने पर उनको बहुत अपयश मिलेगा, क्योंकि सब लोग यही कहेंगे कि भरत जी ने राज्य के लोभ में अपनी माता को वरदान माँगने के लिए उकसाया होगा। इसी अपयश से बचने के लिए उन्होंने गुरु के आदेश का उल्लंघन करने का अधर्म करना उचित समझा।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण शु. 6, सं. 2082 वि. (30 जुलाई, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com