मौन विरह
मौन विरह
—1—
रंग बदले जब पत्तों ने/
शाखाएँ हुईं उदास/
वृक्ष रहा मौन-निश्चल/
और जड़ें रोईं /
… भीतर ही भीतर।
—2 —
पत्ते बिछुड़े/
हुईं शाखें निर्वाक /
वृक्ष की चुप्पी में/
सिसकती जड़े –
विरह का आर्तनाद।
अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’
मौन विरह
—1—
रंग बदले जब पत्तों ने/
शाखाएँ हुईं उदास/
वृक्ष रहा मौन-निश्चल/
और जड़ें रोईं /
… भीतर ही भीतर।
—2 —
पत्ते बिछुड़े/
हुईं शाखें निर्वाक /
वृक्ष की चुप्पी में/
सिसकती जड़े –
विरह का आर्तनाद।
अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’