कविता

अरे वो फुटबॉल

कभी इस पैर से तो कभी उस पैर से
ठोकर मारे जाते वो फुटबॉल,
कभी आया है अपनी मान सम्मान का ख्याल,
या फिर लुढ़कना ही रह गया है तुम्हारा काम,
भूलकर अपने भविष्य का अंजाम,
अपने लिये भीड़ तो लाते हो,
पर अपने हृदय का दर्द क्यों नहीं दिखाते हो,
दो टीमों के बीच पिस रहे हो,
क्या लात पड़ने की खुशी का
चंदन घिस रहे हो,
तुमने कभी सोचा है कि
तुम्हारे बिना इन खिलाड़ियों का
हर मूवमेंट खेल अधूरा है,
या फिर लतखोर बन लुढ़क रहे सिर्फ इसलिए कि
चढ़ चुका मन मस्तिष्क पर किसी का धतूरा है,
भूल रहे हो कि लात तुम खा रहे
और इनाम कोई और पा रहा है,
अपनी खेल कौशल की बात कर
वो मदमस्त हो झूमा जा रहा है,
तुम्हारे चुप रहने या खुश रहने से
तुम्हारी बिरादरी के अन्य फुटबालों पर
क्या बीत रही होगी क्या प्रभाव पड़ रहा होगा,
कौन कहां मर रहा कहां सड़ रहा होगा,
खिलाड़ियों के पिछलग्गू बन या कहें दलाल बन
कितनों भी उछल लो,
लतखोर ही कहलाओगे भले जीयो मचल मचल।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554