नवगीत – कचरे वाली गाड़ी
देखो खड़ी सड़क पर टेरे कचरे वाली गाड़ी।
कूड़ेदान उठाओ अपने दौड़ो शीघ्र उँडेलो
नहीं अधिक वह खड़ी रहेगी कचरा बाहर ठेलो
आगे – आगे बढ़ो बहन जी रहना नहीं पिछाड़ी।
छिलके फल सब्जी के किंचित एक न रहने पाए
रोटी सब्जी बची हुई तो कचरे में क्यों जाए
पड़े न रहना घर के भीतर पिए हुए तुम ताड़ी ।
अन्य किसी के दरवाजे पर नहीं फेंकना कूड़ा
सिर के बाल गली में कोई और न डालें जूड़ा
रखनी हरी- भरी हर क्यारी छत पर ठाड़ी बाड़ी।
— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम्’
