लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 13)
जब सुमन्त्र जी को निषादराज गुह के आने की सूचना मिली, तो वे बहुत प्रसन्न हुए और उनको खेद भी हुआ कि हमने स्वयं निषादराज को अपने आने की सूचना नहीं दी। वे बड़े स्नेह से निषादराज से मिले और तत्काल जाकर भरत जी को बताया कि शृंगवेरपुर के वयोवृद्ध राजा निषादराज गुह श्री राम के सखा हैं और आपसे मिलने आये हैं। यह सुनकर भरत जी तत्काल उठकर उनसे मिलने को तत्पर हो गये। उन्होंने सम्मानपूर्वक उनको बुला लाने के लिए कहा।
शीघ्र ही गुह अपने मंत्रियों के साथ उनके शिविर में आये। दोनों बहुत प्रेमपूर्वक मिले। भरत जी ने उनको हृदय से लगा लिया। गुह जी ने उनसे कहा- “राजकुमार भरत जी! यह वन प्रदेश आपका ही है। आपके आगमन की सूचना न मिलने के कारण हम आपके स्वागत की कोई तैयारी नहीं कर सके। हमारे पास जो फल-मूल हैं, जो निषाद वृक्षों से तोड़कर लाये हैं, आप उन्हें ग्रहण करें। मुझे आशा है कि आज रात्रि आपकी सेना भी हमारा आतिथ्य ग्रहण करके यहाँ विश्राम करेगी। आप प्रातःकाल अपने इच्छित स्थान को जा सकते हैं।”
भरत जी ने गदगद होकर कहा- “भैया! आप मेरे बड़े भाई श्री राम के प्रिय मित्र हैं। आपके मनोरथ से ही हमारा सत्कार हो गया। बन्धु! मैं प्रातःकाल ही ऋषि भरद्वाज के आश्रम की ओर जाना चाहता हूँ। आप बस मुझे यह बताइए कि यहाँ से ऋषि के आश्रम की ओर जाने वाला मार्ग कौन सा है, क्योंकि यहाँ से दो मार्ग दिखाई दे रहे हैं। गंगा के किनारे का यह प्रदेश तो बड़ा दुर्गम प्रतीत होता है। इसको लाँघकर आगे बढ़ना कठिन लगता है।“
इस पर गुह जी ने हाथ जोड़कर भरत जी से कहा- “राजकुमार! हमारे अनेक मल्लाह इस प्रदेश से पूर्णतः परिचित हैं, वे मार्ग दिखाने आपके साथ जायेंगे और मैं स्वयं भी आपके साथ चलूँगा। लेकिन राजकुमार! आपकी यह विशाल सेना देखकर मेरे मन में शंका उत्पन्न हो रही है। कहीं आप श्री राम के प्रति कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं जा रहे हैं?“
यह सुनकर दुःखी हुए भरत जी ने कहा- “निषादराज! ईश्वर हमें ऐसा समय कभी न दिखाए। तुम्हारी बात सुनकर मुझे कष्ट हुआ है। तुम्हें मेरे ऊपर संदेह नहीं करना चाहिए। मैं श्री राम को पिता के समान मानता हूँ। मैं उन्हें अयोध्या लौटा लाने के लिए जा रहा हूँ। इसके अलावा मेरा अन्य कोई विचार नहीं है।” यह कहते हुए भरत जी के नेत्र सजल हो गये।
इससे निषादराज गुह का सन्देह पूरी तरह मिट गया। वे हर्ष से गदगद हो गये। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा- “राजकुमार! आप धन्य हैं, जो बिना प्रयास के ही हाथ में आये हुए इस विशाल साम्राज्य को त्याग देना चाहते हैं। आप जैसा व्यक्ति इस भूमंडल पर कोई नहीं होगा। आपने वन में कष्टपूर्वक रहने वाले श्री राम को लौटा लाने का जो विचार किया है, वह आपके ही योग्य है। इससे समस्त भूमंडल पर आपकी कीर्ति का विस्तार होगा।“
इस प्रकार बातें करते-करते सूर्यदेव अस्त हो चुके थे और अँधेरा हो चुका था, इसलिए भरत जी ने सेना को विश्राम करने की आज्ञा दी और स्वयं शत्रुघ्न जी के साथ शयन करने जाने लगे। उनको निषादराज का सन्देह मिट जाने पर अतीव सन्तोष हुआ। उनको श्री राम का वियोग और अधिक कष्ट देने लगा। वे श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण जी के बारे में सोचने लगे। वे श्री राम और सीता जी द्वारा उठाये गये कष्टों की कल्पना करके वे दुःखी हो रहे थे और स्वयं को उनके कष्टों का मूल कारण मान रहे थे।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण शु. 12, सं. 2082 वि. (5 अगस्त, 2025)
