स्वप्न या हकीकत
एक तरफ कुंआ और
एक तरफ खाई है,
देखो चोर चोर मौसेरे भाई है,
एक पुचकारता है एक दहलाता है,
मरे कटे कोई भी इनका क्या जाता है,
बातों में
एक उखाड़ता है एक बसाता है,
एक का छुड़ाने का नाटक एक फंसाता है,
हमारे जीवन की बागडोर इन्हीं ने पकड़ा है,
हमारी मस्तिष्क को इनकी चालों ने जकड़ा है,
एक संयम की मूरत दूजे की चालबाजी,
अंत में आधा इनका और उनकी होगी आधी,
चक्र का ये प्रणेता देखो धुरंधर है,
शक्ल से बदसूरत और चालें भयंकर है,
ये इनकी राजनीति और यही कूटनीति,
देखना न चाहे एका चलाते हैं फुटनीति,
बनते हैं पथप्रदर्शक और बनते पुरोधा है,
ये अपनी राह बनाने घर बहुतों का खोदा है,
लोगों को मूर्ख बनाना इनकी परंपरा है,
पद प्रतिष्ठा इनको मिलता अनुकंपा है,
सच्चाई न पास इनके और न नैतिकता है,
उलजुलूल बोल है देते नहीं कोई तार्किकता है,
डराते इन सपनों से बच मुश्किल से जागा हूं,
जाना था कहां मुझको और कहां को भागा हूं,
नहीं बातों में मजबूती और नहीं मैं सशक्त,
हो न हो बन सकता हूं मैं भी कोई अंधभक्त,
समय हो जब अनुकूल तब
कुत्ता हाथी सा चलता है,
वक्त बदलते ही,कुछ न संभलता है।
— राजेन्द्र लाहिरी
