कहानी

कहानी: डिजिटल राखी

रक्षाबंधन की सुबह थी। मुंबई के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहने वाली श्रद्धा की आँखें अलार्म के तीसरी बार बजने के बाद खुलीं। खिड़की से बाहर झाँका तो बादलों से ढका आसमान और हल्की फुहारें उसके मन की हलचल से मेल खा रही थीं। लेकिन आज कुछ अलग था—आज रक्षाबंधन था।

श्रद्धा की माँ हर साल इस दिन पर घर को फूलों से सजाती थीं, मिठाई बनती थी, और भाई को तिलक लगाकर राखी बाँधने के बाद आरती उतारी जाती थी। लेकिन इस बार सब कुछ बदल चुका था। अब वह अकेली थी। माँ-पापा को गए हुए दो साल हो चुके थे, और भाई ऋषभ अमेरिका में था।

श्रद्धा ने अपने मोबाइल पर व्हाट्सएप खोला और भाई को “हैप्पी राखी भैया” का मैसेज भेज दिया। थोड़ी देर बाद उसने अपने लैपटॉप पर ज़ूम मीटिंग का लिंक खोल लिया — यह ऑफिस मीटिंग नहीं, भाई के साथ एक वर्चुअल राखी सेरेमनी की थी।

लिंक पर क्लिक करते ही स्क्रीन पर ऋषभ की मुस्कुराती हुई शक्ल आई। “हाय दीदी! कैसी हो?”

“ठीक हूँ भैया… तुम्हें राखी की ढेर सारी शुभकामनाएं।” श्रद्धा ने कैमरे के सामने एक राखी दिखाई, और फिर पास रखे एक छोटे से थाल में तिलक, चावल और मिठाई का इंतज़ाम कर लिया।
ऋषभ मुस्कुराया, “इस बार कुछ खास किया है मैंने।”
“क्या?”
“तूने जो राखी मुझे मेल से भेजी थी, वो मैंने 3D प्रिंटर से प्रिंट की… और फिर उसको फ्रेम में लगवा लिया। मेरे वर्कडेस्क पर है।”

श्रद्धा की आँखें भीग गईं। उसने जानबूझ कर राखी इस बार अमेरिका भेजी थी, भले ही हर साल भाई मना करता था। आज पहली बार उसे लगा कि डिजिटल दूरी के बावजूद रिश्ता ज़िंदा है।

श्रद्धा ने तिलक किया, मिठाई खिलाई (स्क्रीन पर ही सही), और राखी बाँधी। ऋषभ ने भी डिजिटल गिफ्ट कार्ड भेजा, साथ में एक लंबा सा ईमेल: “दीदी, हर साल तेरा बिना बोले सब कुछ समझ जाना, मेरी छोटी-छोटी बातों पर मुस्कुरा देना, और बिना कहे ही मेरी दुनिया को ठीक कर देना… इन सबका कोई मोल नहीं है। मैं जानता हूँ, तू अब अकेली है। पापा-मम्मी के जाने के बाद ये त्यौहार भी जैसे बेमानी हो गया था, लेकिन तूने कभी मुझे फील नहीं होने दिया। तू मेरी सबसे बड़ी ताक़त है। राखी केवल धागा नहीं है, ये एक वादा है — कि चाहे मैं कितनी भी दूर रहूँ, तुझे हमेशा अपनी हिफाज़त में रखूँगा। और हाँ… अगली बार राखी पर मैं इंडिया आ रहा हूँ। रियल राखी के लिए। – तेरा ऋषभ”

श्रद्धा की आँखों से आँसू बह निकले। उसके मन की सूनी राखी अचानक सबसे खूबसूरत हो गई।

श्रद्धा एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर डिजाइनर थी। वह अपने काम में माहिर थी, आत्मनिर्भर और संवेदनशील भी। लेकिन हर बार रक्षाबंधन आते ही वह एक बच्ची बन जाती थी। माँ के हाथों की बनी खीर, पापा की शरारतें, और ऋषभ का मिठाई के लिए जिद करना — ये सब यादें आज भी ताज़ा थीं।

आज उसने ऑफिस से छुट्टी ली थी। एक ओर ज़ूम कॉल से भाई को राखी बाँध दी थी, पर दिल का कोना अब भी अधूरा था। वह बालकनी में बैठी थी, आसमान की ओर देख रही थी।

तभी दरवाज़े की घंटी बजी। “कौन हो सकता है?” उसने मन में सोचा। दरवाज़ा खोला तो सामने डिलीवरी बॉय खड़ा था। हाथ में एक खूबसूरत पैकेट था। “मैम, यह आपके लिए अमेरिका से है।”

श्रद्धा ने हस्ताक्षर किए और पैकेट खोला। उसमें एक छोटा सा म्यूजिकल बॉक्स था। जैसे ही उसने ढक्कन खोला, एक प्यारी सी धुन बजने लगी — वही गाना जो वो और ऋषभ बचपन में मिलकर गाते थे: “फूलों का तारों का, सबका कहना है, एक हज़ारों में मेरी बहना है” बॉक्स के अंदर एक पेंडेंट था, जिसमें उनके बचपन की फोटो जड़ी थी, और एक छोटा सा कार्ड:
“दीदी,
यह हमारे बचपन की आवाज़ है। ताकि जब भी तू खुद को अकेला महसूस करे, यह तुझे याद दिला दे कि मैं हमेशा तेरे साथ हूँ।
– ऋषभ”
श्रद्धा ने वह पेंडेंट अपने गले में पहन लिया। वह अब मुस्कुरा रही थी, और उस मुस्कुराहट में आँसू भी थे, सुकून भी।

शाम को श्रद्धा अपनी कॉलोनी के बच्चों के साथ मिलकर एक छोटा-सा राखी समारोह आयोजित करती है। वह जानती है कि बहुत से बच्चे ऐसे हैं जिनके भाई दूर रहते हैं या हैं ही नहीं। वह उन बच्चों को राखी बाँधने का अवसर देती है और उन्हें बताती है कि भाई-बहन का रिश्ता केवल खून का नहीं होता, भावनाओं का भी होता है।

वहाँ एक छोटी बच्ची, सिम्मी, उससे पूछती है, “दीदी, अगर मेरा कोई भाई नहीं है तो क्या मैं किसी को राखी नहीं बाँध सकती?” श्रद्धा मुस्कुरा कर कहती है, “तू जिसे अपना मीत समझे, उसे राखी बाँध सकती है। रक्षा का रिश्ता प्यार का होता है, खून का नहीं।”

वह बच्ची अपनी एक सहेली को राखी बाँधती है और सब तालियाँ बजाते हैं। श्रद्धा की आँखों में चमक थी। उसने महसूस किया कि रक्षाबंधन अब केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं, यह एक सामाजिक भावना बन गया है — एक-दूसरे की रक्षा का संकल्प।

रात को जब श्रद्धा ने अपने कमरे की लाइट बंद की, तो दीवार पर उस पेंडेंट की छाया थी। जैसे उसकी स्मृतियाँ अब भी उसके पास थीं। मोबाइल पर ऋषभ का एक और मैसेज आया: “दीदी, अगली बार जब तू राखी बाँध रही होगी, मैं तेरे सामने बैठा रहूँगा… कोई स्क्रीन नहीं, कोई दूरी नहीं।”

श्रद्धा ने रिप्लाई किया: “मैं इंतज़ार करूँगी, भैया। इस बार राखी सिर्फ डिजिटल नहीं होगी… असली होगी, गर्माहट के साथ।” वह मुस्कुराई, और चैन से सो गई।

— डॉ. सत्यवान सौरभ,

*डॉ. सत्यवान सौरभ

✍ सत्यवान सौरभ, जन्म वर्ष- 1989 सम्प्रति: वेटरनरी इंस्पेक्टर, हरियाणा सरकार ईमेल: satywanverma333@gmail.com सम्पर्क: परी वाटिका, कौशल्या भवन , बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045 मोबाइल :9466526148,01255281381 *अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों भाषाओँ में समान्तर लेखन....जन्म वर्ष- 1989 प्रकाशित पुस्तकें: यादें 2005 काव्य संग्रह ( मात्र 16 साल की उम्र में कक्षा 11th में पढ़ते हुए लिखा ), तितली है खामोश दोहा संग्रह प्रकाशनाधीन प्रकाशन- देश-विदेश की एक हज़ार से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशन ! प्रसारण: आकाशवाणी हिसार, रोहतक एवं कुरुक्षेत्र से , दूरदर्शन हिसार, चंडीगढ़ एवं जनता टीवी हरियाणा से समय-समय पर संपादन: प्रयास पाक्षिक सम्मान/ अवार्ड: 1 सर्वश्रेष्ठ निबंध लेखन पुरस्कार हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी 2004 2 हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड काव्य प्रतियोगिता प्रोत्साहन पुरस्कार 2005 3 अखिल भारतीय प्रजापति सभा पुरस्कार नागौर राजस्थान 2006 4 प्रेरणा पुरस्कार हिसार हरियाणा 2006 5 साहित्य साधक इलाहाबाद उत्तर प्रदेश 2007 6 राष्ट्र भाषा रत्न कप्तानगंज उत्तरप्रदेश 2008 7 अखिल भारतीय साहित्य परिषद पुरस्कार भिवानी हरियाणा 2015 8 आईपीएस मनुमुक्त मानव पुरस्कार 2019 9 इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ रिसर्च एंड रिव्यु में शोध आलेख प्रकाशित, डॉ कुसुम जैन ने सौरभ के लिखे ग्राम्य संस्कृति के आलेखों को बनाया आधार 2020 10 पिछले 20 सालों से सामाजिक कार्यों और जागरूकता से जुडी कई संस्थाओं और संगठनों में अलग-अलग पदों पर सेवा रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 9466526148 (वार्ता) (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) 333,Pari Vatika, Kaushalya Bhawan, Barwa, Hisar-Bhiwani (Haryana)-127045 Contact- 9466526148, 01255281381 facebook - https://www.facebook.com/saty.verma333 twitter- https://twitter.com/SatyawanSaurabh