कविता

राखी के धागों में बँधी दुआएँ

राखी के धागों में बँधी दुआएँ,
हर साल बहना की आँखें भर लाएँ।
सपनों में जब भी तू आता है भैया,
मन आँगन मेरा मुस्काए।

तेरे बचपन की शरारतें याद हैं मुझे,
वो किताबों के बीच छुपाई मिठाइयाँ।
हर रक्षाबंधन पर करती हूँ इंतज़ार,
तेरे हाथों से बँधी मेरी कलाईयाँ।

ना चाँदी की ज़रूरत, ना सोने की डोरी,
तेरा प्यार ही है मेरी सबसे बड़ी कोरी।
माँ की ममता और तेरे प्यार का चंदन,
हर बंधन से पवित्र ये राखी का बंधन।

जब तू कहता है – “मैं हूँ ना”,
तो सारी दुनिया छोटी लगती है।
तेरे भरोसे पर जीती हूँ मैं,
तेरी बहन हर हाल में तुझसे जुड़ी लगती है।

बचपन की झगड़े, अब याद बन गए,
मगर वो रक्षा का वादा आज भी जिंदा है।
कभी तू दूर है, कभी पास है,
मगर मेरा विश्वास हमेशा तुझमें बंदा है।

आज फिर एक राखी बाँध रही हूँ,
तेरी सलामती की दुआ के साथ।
भले तू हजारों मील दूर सही,
मगर दिल में है तू हर साँस के साथ।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh